श्री सत्यनारायण व्रतकथा

AnandShastri
0
आनन्द शास्त्री

🕉️ श्री सत्यनारायण व्रत कथा

अथ श्रीसत्यनारायणव्रतकथा – प्रथम अध्याय


व्यास उवाच

एकदा नैमिषारण्ये ऋषयः शोनकादयः । पप्रच्छुर्मुनयः सर्वे सूतं पौराणिकं खलु ।। 1 ।।

अर्थ : श्रीव्यासजी ने कहा— एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि सभी ऋषियों तथा मुनियों ने पुराणशास्त्र के वेत्ता श्री सूतजी महाराज से पूछा — ।। 1 ।।


ऋषयः ऊचुः

व्रतेन तपसा किं वा प्राप्यते वाञ्छितं फलम् । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामः कथयस्व महामुने ।। 2 ।।

अर्थ : ऋषियों ने कहा — महामुने! किस व्रत अथवा तपस्या से मनोवांछित फल प्राप्त होता है, उसे हम सब सुनना चाहते हैं, आप कहें। ।। 2 ।।


सूत उवाच

नारदेनैव समपृष्टो भगवान् कमलापतिः । सुरर्षये यथैवाह तच्छृणुध्वं समाहितः ।। 3 ।।

एकदा नारदो योगी परानुग्रहकाक्षया । पर्यटन् विविधान् लोकान् मर्त्यलोकमुपागतः ।। 4 ।।

ततो दृष्वा जनान् सर्वान् नानाक्लेशसमन्वितान् । नानायोनिसमुत्पन्नान् क्लिश्यमानान् स्वकर्मभिः ।। 5 ।।

केनोपायेन चैतेषां दुःखनाशे भवेद् ध्रूवम् । इति संचिन्त्य मनसा विष्णुलोकं गतस्तदा ।। 6 ।।


अर्थ :
श्रीसूतजी बोले — उसी तरह देवर्षि नारदजी ने भी भगवान् कमलापति से पूछा। एक बार नारदजी लोगों के कल्याण की इच्छा से विभिन्न लोकों में भ्रमण करते हुए मृत्युलोक आए। उन्होंने यहाँ विभिन्न योनियों में जन्मे प्राणियों को अपने कर्मों के अनुसार दुख भोगते देखा। और सोचा — इनके दुख कैसे समाप्त हों? यही विचार करके वे विष्णुलोक गए।। 3–6 ।।


तत्र नारायणँ देवं शुक्लवर्णं चतुर्भुजम् । शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविभूषितम् ।। 7 ।।


वहाँ चार भुजाओंवाले और शंख चक्र गदा, पद्म, तथा वनमालासे विभूषित शुक्लवर्ण भगवान् नारायणका दर्शन कर उन देवाधिदेवकी वे स्तुति करने लगे ।।

नारद उवाच

दृष्टा तं देवदेवेश स्तोतुं समुपचक्रमे । नमो वाङ्मनसातीतरूपायानन्तशक्तये ।। 8 ।। 

आदिमध्यान्तहीनाय निर्गुणाय गुणात्मने । सर्वेषामादिभूताय भक्तानामार्तिनाशिने ।। 9 ।। 


अर्थ :
नारद जी बोले - हे वाणी और मन से परे स्वरूपवाले, अनन्तशक्तिसम्पन्न, आदि मध्य और अन्तसे रहित, निर्गुण और सकल कल्याणमय गुणोसेसम्पन्न, स्थावर-जङ्गमात्मक निखिल सृष्टिप्रपञ्चके कारणभूत तथा भक्तोंकी पीड़ा नष्ट करने-वाले परमात्मन्! को नमस्कार हैं। स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान् श्रीविष्णुने नारद जी से कहा ।। 8-9 ।।


श्रीभगवानुवाच

श्रुत्वा स्तोत्रं ततो विष्णुर्नारदं प्रत्यभाषत । किमर्थमागतोऽसि त्वं किं ते मनसि वर्तते ।
कथयस्व महाभाग तत्सर्वं कथयामि ते ।। 10 ।।

अर्थ :
श्रीभगवान् ने कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहाँ आये हैं, आपके मनमें क्या हैं, कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताऊँगा ।। 10 ।।


नारदउवाच

मर्त्यलोके जनाः सर्वे नानाक्लेशसमन्विताः । नानायोनिसमुत्पन्नाः पच्यन्ते पापकर्मभिः ।। 11 ।।

तत्कथं शमयेन्नाथ लघूपायेन तद्वद । श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं कृपास्ति यदि ते मयि ।। 12 ।।

अर्थ :
नारदजी बोले - भगवन् मृत्युलोकमें अपने पापकर्मोके द्वारा विभिन्न योनियोंमें उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकारके क्लेशोंसे दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपायसे उनके कष्टोंका निवारण हो सकेगा यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूँ उसे बतायें ।। 11-12 ।।

श्रीभगवानुवाच

साधु पृष्टं त्वया वत्स लोकानुग्रहकाङ्क्षया । यत्कृत्वा मुच्यते मोहात् तच्छृणुष्व वदामि ते ।। 13 ।।

व्रतमस्ति महत्पुण्यं स्वर्गे मर्त्ये च दुर्लभम् । तव स्नेहान्महा वत्स प्रकाशः क्रियतेऽधुना ।। 14 ।।

सत्यनारायणस्यैव व्रतं सम्यग्विधानतः । कृत्वा सद्यः सुखं भुक्त्वा परत्र मोक्षमाप्नुयात् ।। 15 ।।



अर्थ :
नारदजी बोले - हे वत्स! संसारके ऊपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे आपने बहुत अच्छी (उत्तम) बात पुछी है। जिस [व्रत] के करनेसे प्राणी मोहसे मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूँ, सुनें हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोकमें दुर्लभ (भगवान् सत्यनारायणका) एक महान् पुण्यप्रद व्रत है। आपके स्नेहके कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूँ। अच्छी प्रकार विधि-विधानसे भगवान् सत्यनारायणका व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्तकर परलोकमें मोक्ष प्राप्त कर सकता हैं। भगवानकी ऐसी वाणी सुनकर नारद मुनिने कहा ।। 13-15 ।।


नारद उवाच

तच्छु्त्वा भगवद्वाक्यं नारदो मुनिब्रवीत् । किं फलं किं विॆधानं च कृतं केनैव तद् व्रतम् ।। 16 ।।

अर्थ :
नारदजी बोले- प्रभो! इस व्रतको करनेका फल क्या है, इसका विधान क्या है, इस व्रतको किसने किया और कब इसे करना चाहिये? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये ।। 16 ।।

श्रीभगवानुवाच

तत्सर्वं विस्तराद् ब्रूहि कदा कार्यं व्रतं प्रभो । दुःखशोकादिशमनं धनधान्यप्रवर्धनम् ।। 17 ।।

सौभाग्यसंततिकरं सर्वत्र विजयप्रदम् । यस्मिन् कस्मिन् दिने मर्त्यो भक्तिश्रद्धासमन्वितः ।। 18 ।।

सत्यनारायणं देवं यजेच्चैव निशामुखे । ब्राह्मणैर्बान्धवैश्चैव सहितो धर्मतत्परः ।। 19 ।।

नैवेद्यं भक्तितो दद्यात् सपादं भक्ष्यमुत्तमम् । रम्भाफलं घृतं क्षीरं गोधूमस्य च चूर्णकम् ।। 20 ।।

अभावे शालिचूर्णं वा शर्करा वा गुडस्तथा । सपादं सर्वभक्ष्याणि चैकीकृत्य निवेदयेत् ।। 21 ।।


अर्थ :
श्रीभगवान् ने कहा — यह सत्यनारायणव्रत दुःख-शोक आदिका शमन करनेवाला, धन-धान्यकी वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और संतान देनेवाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करनेवाला हैं। जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धासे समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धु-बान्धवों के साथ धर्ममें तत्पर होकर सायंकाल भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करें। नैवेद्यके रूप में उत्तम कोटिके भोजनीय पदार्थको सवाया मात्रामें भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिये। केलेका फल, घी, दूध, गेहूँका चूर्ण, अथवा गेहूँके चूर्णके अभावमें साठी चावलका चूर्ण, शक्कर या गुड़ — यह सब भक्ष्य सामग्री सवाया मात्रामें एकत्र कर निवेदित करनी चाहिये ।। 17-21 ।।


विप्राय दक्षिणां दद्यात् कथां श्रुत्वा जनै सह । ततश्च बन्धुभिः सार्धं विप्रांश्च प्रतिभोजयेत् ।। 22 ।।

प्रसादं भक्षयेद् भक्त्या नृत्यगीतादिकं चरेत् । ततश्च स्वगृहं गच्छेत् सत्यनारायणं स्मरन् ।। 23 ।।

एवं कृते मनुष्याणां वाच्छासिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् । विशेषतः कलियुगे लघूपायोऽस्ति भूतले ।। 24 ।।

दूसरा अध्याय

निर्धन ब्राह्मण तथा काष्ठक्रेताकी कथा


सूत उवाच

अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि कृतं येन पुरा द्विजाः । कश्चित् काशीपुरे रम्ये ह्यासीद् विप्रोऽतिनिर्धनः ॥ १॥

क्षुत्तृड्भ्यां व्याकुलो भूत्वा नित्यं बभ्राम भूतले । दुःखितं ब्राह्मणं दृष्ट्वा भगवान् ब्राह्मणप्रियः ॥ २॥

वृद्धब्राह्मणरूपस्तं पप्रच्छ द्विजमादरात् । किमर्थं भ्रमसे विप्र महीं नित्यं सुदुःखितः ॥ ३ ॥

ब्राह्मण उवाच

तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथ्यतां द्विजसत्तम । ब्राह्मणोऽतिदरिद्रोऽहं भिक्षार्थं वै भ्रमे महीम् ॥ ४॥


अर्थ :
श्रीसूतजी बोले— हे द्विजो! अब मैं पुनः पूर्वकालमें जिसने इस सत्यनारायणव्रतको किया था, उसे भलीभाँति विस्तारपूर्वक कहूँगा। रमणीय काशी नामक नगरमें कोई अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख और प्याससे व्याकुल होकर वह प्रतिदिन पृथ्वीपर भटकता रहता था। ब्राह्मणप्रिय भगवान्ने उस दुःखी ब्राह्मणको देखकर वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण करके उस द्विजसे आदरपूर्वक पूछा — हे विप्र! प्रतिदिन अत्यन्त दुःखी होकर तुम किसलिये पृथ्वीपर भ्रमण करते रहते हो। हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १–३/३ ॥

वृद्धब्राह्मण उवाच

उपायं यदि जानासि कृपया कथय प्रभो । सत्यनारायणो विष्णुर्वाञ्छितार्थफलप्रदः ॥ ५ ॥

अर्थ :
ब्राह्मण बोला— प्रभो! मैं अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण हूँ और भिक्षाके लिये ही पृथ्वीपर घूमा करता हूँ। यदि [मेरी इस दरिद्रताको दूर करनेका] आप कुछ उपाय जानते हों तो कृपापूर्वक बतलाइये ॥ ४९/ ॥


तस्य त्वं पूजनं विप्र कुरुष्व व्रतमुत्तमम् । यत्कृत्वा सर्वदुःखेभ्यो मुक्तो भवति मानवः ॥ ६ ॥

विधानं च व्रतस्यापि विप्रायाभाष्य यत्नतः । सत्यनारायण वृद्धस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ७ ॥

तद् व्रतं संकरिष्यामि यदुक्तं ब्राह्मणेन वै । इति संचिन्त्य विप्रोऽसौ रात्रौ निद्रां न लब्धवान् ॥ ८ ॥


अर्थ :
वृद्ध ब्राह्मणने कहा— [हे ब्राह्मणदेव!] सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फलको देनेवाले हैं। हे विप्र! तुम उनका उत्तम व्रत एवं पूजन करो, जिसे करनेसे मनुष्य सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है। व्रतके विधानको भी ब्राह्मणसे यत्नपूर्वक कहकर वृद्धब्राह्मणरूपधारी भगवान् सत्यनारायण वहींपर अन्तर्धान हो गये। “वृद्ध ब्राह्मणने जैसा कहा है, उस व्रतको अच्छी प्रकारसे वैसे ही करूँगा”— यह सोचते हुए उस ब्राह्मणको रातमें नींद नहीं आयी ॥ ५–८ ॥


ततः प्रातः समुत्थाय सत्यनारायणव्रतम् । करिष्य इति संकल्प्य भिक्षार्थमगमद् द्विजः ॥ ९ ॥

तस्मिन्नेव दिने विप्रः प्रचुरं द्रव्यमाप्तवान् । तेनैव बन्धुभिः सार्धं सत्यस्य व्रतमाचरत् ॥ १० ॥

सर्वदुःखविनिर्मुक्तः सर्वसम्पत्समन्वितः । बभूव स द्विजश्रेष्ठो व्रतस्यास्य प्रभावतः ॥ ११ ॥

ततः प्रभृतिकालं च मासि मासि व्रतं कृतम् ।

एवं नारायणस्येदं व्रतं कृत्वा द्विजोत्तमः । सर्वपापविनिर्मुक्तो दुर्लभं मोक्षमाप्तवान् ॥ १२ ॥


अर्थ :
तदनन्तर प्रातःकाल उठकर ‘सत्यनारायणका व्रत करूँगा’ ऐसा संकल्प करके वह ब्राह्मण भिक्षाके लिये चल पड़ा। उस दिन ही ब्राह्मणको [भिक्षामें] बहुत-सा धन प्राप्त हुआ। उसी धनसे उसने बन्धु-बान्धवोंके साथ भगवान् सत्यनारायणका व्रत किया। इस व्रतके प्रभावसे वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी दुःखोंसे मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियोंसे सम्पन्न हो गया। उस दिनसे लेकर प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस प्रकार भगवान् सत्यनारायणके इस व्रतको करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी पापोंसे मुक्त हो गया और उसने दुर्लभ मोक्षपदको प्राप्त किया ॥ ९–१२ ॥


व्रतमस्य यदा विप्र पृथिव्यां संकरिष्यति । तदैव सर्वदुःखं तु मनुजस्य विनश्यति ॥ १३ ॥

एवं नारायणेनोक्तं नारदाय महात्मने । मया तत्कथितं विप्राः किमन्यत् कथयामि वः ॥ १४ ॥


अर्थ :
हे विप्र! पृथ्वीपर जब भी कोई मनुष्य श्रीसत्यनारायणका व्रत करेगा, उसी समय उसके समस्त दुःख नष्ट हो जायँगे। हे ब्राह्मणो! इस प्रकार भगवान् नारायणने महात्मा नारदजीसे जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगोंसे कह दिया, आगे अब और क्या कहूँ? ॥ १३–१४ ॥


ऋषय ऊचुः

तस्माद् विप्राच्छ्रतं केन पृथिव्यां चरितं मुने । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामः श्रद्धाऽस्माकं प्रजायते ॥ १५ ॥

अर्थ :
ऋषियोंने कहा— हे मुने! इस पृथ्वीपर उस ब्राह्मणसे सुने हुए इस व्रतको किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, क्योंकि हमारे भीतर श्रद्धा उत्पन्न हो रही है ॥ १५ ॥

सूत उवाच

शृणुध्वं मुनयः सर्वे व्रतं येन कृतं भुवि । एकदा स द्विजवरो यथाविभवविस्तरैः ॥ १६ ॥

बन्धुभिः स्वजनैः सार्धं व्रतं कर्तुं समुद्यतः । एतस्मिन्नन्तरे काले काष्ठक्रेता समागमत् ॥ १७ ॥

बहिः काष्ठं च संस्थाप्य विप्रस्य गृहमाययौ । तृष्णया पीडितात्मा च दृष्ट्वा विप्रं कृतं व्रतम् ॥ १८ ॥

प्रणिपत्य द्विजं प्राह किमिदं क्रियते त्वया । कृते किं फलमाप्नोति विस्तराद् वद मे प्रभो ॥ १९ ॥


अर्थ :
श्रीसूतजी बोले— मुनियो! पृथ्वीपर जिसने यह व्रत किया, उसे आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्तिके अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा पारिवारिकजनोंके साथ व्रत करनेके लिये उद्यत हुआ। इसी बीच एक लकड़हारा वहाँ आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मणके घर गया। प्याससे व्याकुल वह उस ब्राह्मणको व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे बोला— प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करनेसे किस फलकी प्राप्ति होती है, विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये ॥ १६–१९ ॥


विप्र उवाच

सत्यनारायणस्येदं व्रतं सर्वेप्सितप्रदम् । तस्य प्रसादान्मे सर्वं धनधान्यादिकं महत् ॥ २० ॥

तस्मादेतद् व्रतं ज्ञात्वा काष्ठक्रेताऽतिहर्षितः । पपौ जलं प्रसादं च भुक्त्वा स नगरं ययौ ॥ २१ ॥

सत्यनारायणं देवं मनसा इत्यचिन्तयत् । काष्ठं विक्रयतो ग्रामे प्राप्यते चाद्य यद् धनम् ॥ २२ ॥

तेनैव सत्यदेवस्य करिष्ये व्रतमुत्तमम् । इति संचिन्त्य मनसा काष्ठं धृत्वा तु मस्तके ॥ २३ ॥

जगाम नगरे रम्ये धनिनां यत्र संस्थितिः । तद्दिने काष्ठमूल्यं च द्विगुणं प्राप्तवानसौ ॥ २४ ॥


अर्थ :
विप्रने कहा— यह सत्यनारायणका व्रत है, जो सभी मनोरथोंको प्रदान करनेवाला है। उसीके प्रभावसे मुझे यह सब महान् धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद ग्रहण करके वह नगर चला गया। सत्यनारायणदेवके लिये मनसे ऐसा सोचने लगा कि “आज लकड़ी बेचनेसे जो धन प्राप्त होगा, उसी धनसे भगवान् सत्यनारायणका श्रेष्ठ व्रत करूँगा।” इस प्रकार मनसे चिन्तन करता हुआ लकड़ीको मस्तकपर रखकर उस सुन्दर नगरमें गया, जहाँ धन-सम्पन्न लोग रहते थे। उस दिन उसने लकड़ीका दुगुना मूल्य प्राप्त किया ॥ २०–२४ ॥


ततः प्रसन्नहृदयः सुपक्वं कदलीफलम् । शर्कराघृतदुग्धं च गोधूमस्य च चूर्णकम् ॥ २५ ॥

कृत्वैकत्र सपादं च गृहीत्वा स्वगृहं ययौ । ततो बन्धून् समाहूय चकार विधिना व्रतम् ॥ २६ ॥

तद् व्रतस्य प्रभावेण धनपुत्रान्वितोऽभवत् । इहलोके सुखं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ ॥ २७ ॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायणव्रतकथायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


अर्थ :
तदनन्तर प्रसन्न-हृदय होकर वह पके हुए केलेका फल, शर्करा, घी, दूध और गेहूँका चूर्ण सवाया मात्रामें लेकर अपने घर गया। तत्पश्चात् उसने अपने बान्धवोंको बुलाकर विधि-विधानसे भगवान् श्रीसत्यनारायणका व्रत किया। उस व्रतके प्रभावसे वह धन-पुत्रसे सम्पन्न हो गया और इस लोकमें अनेक सुखोंका उपभोगकर अन्तमें सत्यपुर (वैकुण्ठलोक) चला गया ॥ २५–२७ ॥



॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके अन्तर्गत रेवाखण्डमें
श्रीसत्यनारायणव्रतकथाका यह दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

तीसरा अध्याय
राजा उल्कामुख, साधु वणिक् एवं लीलावती-कलावतीकी कथा


सूत उवाच

पुनरग्रे प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं मुनिसत्तमाः । पुरा चोल्कामुखो नाम नृपश्चासीन्महामतिः ॥ १ ॥

जितेन्द्रियः सत्यवादी ययौ देवालयं प्रति । दिने दिने धनं दत्त्वा द्विजान् संतोषयत् सुधीः ॥ २ ॥

भार्या तस्य प्रमुग्धा च सरोजवदना सती । भद्रशीलानदीतीरे सत्यस्य व्रतमाचरत् ॥ ३ ॥

एतस्मिन्नन्तरे तत्र साधुरेकः समागतः । वाणिज्यार्थं बहुधनैरनेकैः परिपूरितः ॥ ४ ॥

नावं संस्थाप्य तत्तीरे जगाम नृपतिं प्रति । दृष्ट्वा स व्रतिनं भूपं पप्रच्छ विनयान्वितः ॥ ५ ॥


अर्थ :
श्रीसूतजी बोले— श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं पुनः आगेकी कथा कहूँगा, आप लोग सुनें। प्राचीन कालमें उल्कामुख नामका एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यन्त बुद्धिमान् था। वह विद्वान् राजा प्रतिदिन देवालय जाता और ब्राह्मणोंको धन देकर संतुष्ट करता था। कमलके समान मुखवाली उसकी धर्मपत्नी शील, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी। राजा एक दिन अपनी धर्मपत्नीके साथ भद्रशीला नदीके तटपर श्रीसत्यनारायणका व्रत कर रहा था। उसी समय व्यापारके लिये अनेक प्रकारकी पुष्कल धनराशिसे सम्पन्न एक साधु (वणिक्) वहाँ आया। भद्रशीला नदीके तटपर नावको स्थापित कर वह राजाके समीप गया और राजाको उस व्रतमें दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा ॥ १–५ ॥

साधुरुवाच

किमिदं कुरुषे राजन् भक्तियुक्तेन चेतसा । प्रकाशं कुरु तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम् ॥ ६ ॥

अर्थ :
साधुने कहा— राजन्! आप भक्तियुक्त चित्तसे यह क्या कर रहे हैं? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥


राजोवाच

पूजनं क्रियते साधो विष्णोरतुलतेजसः । व्रतं च स्वजनैः सार्धं पुत्राद्यावाप्तिकाम्यया ॥ ७ ॥

अर्थ :
राजा बोले— हे साधो! पुत्र आदिकी प्राप्तिकी कामनासे अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ मैं अतुल तेजसम्पन्न भगवान् विष्णुका व्रत एवं पूजन कर रहा हूँ ॥ ७ ॥


भूपस्य वचनं श्रुत्वा साधुः प्रोवाच सादरम् । सर्वं कथय मे राजन् करिष्येऽहं तवोदितम् ॥ ८ ॥

ममापि संततिर्नास्ति ह्येतस्माज्जायते ध्रुवम् । ततो निवृत्त्य वाणिज्यात् सानन्दो गृहमागतः ॥ ९ ॥

भार्यायै कथितं सर्वं व्रतं संततिदायकम् । तदा व्रतं करिष्यामि यदा मे संततिर्भवेत् ॥ १० ॥

इति लीलावतीं प्राह पत्नीं साधुः स सत्तमः । एकस्मिन् दिवसे तस्य भार्या लीलावती सती ॥ ११ ॥


अर्थ :
राजाकी बात सुनकर साधुने आदरपूर्वक कहा— राजन्! इस विषयमें आप मुझे सब कुछ विस्तारसे बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं [व्रत एवं पूजन] करूँगा। मुझे भी संतति नहीं है। “इससे अवश्य ही संतति प्राप्त होगी”— ऐसा विचार कर वह व्यापारसे निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी भार्यासे संतति प्रदान करनेवाले इस सत्यव्रतको विस्तारपूर्वक बताया तथा— “जब मुझे संततिकी प्राप्ति होगी तब मैं इस व्रतको करूँगा”— इस प्रकार उस साधुने अपनी भार्या लीलावतीसे कहा ॥ ८–१० १/२ ॥


भर्तृयुक्तानन्दचित्ताऽभवद् धर्मपरायणा । गर्भिणी साऽभवत् तस्य भार्या सत्यप्रसादतः ॥ १२ ॥

दशमे मासि वै तस्याः कन्यारत्नमजायत । दिने दिने सा ववृधे शुक्लपक्षे यथा शशी ॥ १३ ॥

नाम्ना कलावती चेति तन्नामकरणं कृतम् । ततो लीलावती प्राह स्वामिनं मधुरं वचः ॥ १४ ॥


अर्थ :
एक दिन उसकी लीलावती नामकी सती-साध्वी भार्या पतिके साथ आनन्दचित्तसे ऋतुकालीन धर्माचरणमें प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायणकी कृपासे उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई। दसवें महीनेमें उससे कन्यारत्नकी उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्याका “कलावती” यह नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावतीने अपने स्वामीसे मधुर वाणीमें कहा— आप पूर्वमें संकल्पित श्रीसत्यनारायणके व्रतको क्यों नहीं कर रहे हैं? ॥ ११–१४ ॥

साधुरुवाच

न करोषि किमर्थं वै पुरा संकल्पितं व्रतम् । विवाहसमये त्वस्याः करिष्यामि व्रतं प्रिये ॥ १५ ॥

इति भार्यां समाश्वास्य जगाम नगरं प्रति । ततः कलावती कन्या ववृधे पितृवेश्मनि ॥ १६ ॥

दृष्ट्वा कन्यां ततः साधुर्नगरे सखिभिः सह । मन्त्रयित्वा द्रुतं दूतं प्रेषयामास धर्मवित् ॥ १७ ॥

विवाहार्थं च कन्याया वरं श्रेष्ठं विचारय । तेनाज्ञप्तश्च दूतोऽसौ काञ्चनं नगरं ययौ ॥ १८ ॥

तस्मादेकं वणिक्पुत्रं समादायागतो हि सः । दृष्ट्वा तु सुन्दरं बालं वणिक्पुत्रं गुणान्वितम् ॥ १९ ॥

ज्ञातिभिर्बन्धुभिः सार्धं परितुष्टेन चेतसा । दत्तवान् साधुपुत्राय कन्यां विधिविधानतः ॥ २० ॥


अर्थ :
साधु बोला— “प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूँगा।”इस प्रकार अपनी पत्नीको भलीभाँति आश्वस्त कर वह नगरकी ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिताके घरमें बढ़ने लगी। तदनन्तर धर्मज्ञ साधुने नगरमें सखियोंके साथ अपनी कन्याको विवाहयोग्य देखकर आपसमें मन्त्रणा की और “कन्याके विवाहके लिये श्रेष्ठ वरका अन्वेषण करो”— ऐसा कहकर दूतको शीघ्र भेज दिया। उसकी आज्ञा पाकर दूत काञ्चन नामक नगरमें गया और वहाँसे एक वणिक्का पुत्र लेकर आया। साधुने उस वणिक्पुत्रको सुन्दर और गुणोंसे सम्पन्न देखकर अपनी जातिके लोगों तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ संतुष्टचित्त हो विधि-विधानसे कन्याका दान वणिक्पुत्रके हाथमें कर दिया ॥ १५–२० ॥

ततोऽभाग्यवशात् तेन विस्मृतं व्रतमुत्तमम् । विवाहसमये तस्यास्तेन रुष्टोऽभवत् प्रभुः ॥ २१ ॥

ततः कालेन नियतो निजकर्मविशारदः । वाणिज्यार्थं ततः शीघ्रं जामातृसहितो वणिक् ॥ २२ ॥

रत्नसारपुरे रम्ये गत्वा सिन्धुसमीपतः । वाणिज्यमकरोत् साधुर्जामात्रा श्रीमता सह ॥ २३ ॥

तौ गतौ नगरे रम्ये चन्द्रकेतोर्नृपस्य च । एतस्मिन्नेव काले तु सत्यनारायणः प्रभुः ॥ २४ ॥

भ्रष्टप्रतिज्ञमालोक्य शापं तस्मै प्रदत्तवान् । दारुणं कठिनं चास्य महद् दुःखं भविष्यति ॥ २५ ॥


अर्थ :
उस समय वह (साधु वणिक्) दुर्भाग्यवश भगवान्‌का वह उत्तम व्रत भूल गया। पूर्व-संकल्पके अनुसार विवाहके समयमें व्रत न करनेके कारण भगवान् उसपर रुष्ट हो गये। कुछ समयके पश्चात् अपने व्यापारकर्ममें कुशल वह साधु वणिक् कालकी प्रेरणासे अपने दामादके साथ व्यापार करनेके लिये समुद्रके समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुन्दर नगरमें गया और अपने श्रीसम्पन्न दामादके साथ वहाँ व्यापार करने लगा। तदनन्तर वे दोनों राजा चन्द्रकेतुके रमणीय नगरमें गये। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायणने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर— “इसे दारुण, कठिन और महान् दुःख प्राप्त होगा”— यह शाप दे दिया ॥ २१–२५ ॥

एकस्मिन् दिवसे राज्ञो धनमादाय तस्करः । तत्रैव चागतश्चौरो वणिजौ यत्र संस्थितौ ॥ २६ ॥

तत्पश्चाद् धावकान् दूतान् दृष्ट्वा भीतेन चेतसा । धनं संस्थाप्य तत्रैव स तु शीघ्रमलक्षितः ॥ २७ ॥

ततो दूताः समायाता यत्रास्ते सज्जनो वणिक् । दृष्ट्वा नृपधनं तत्र बद्ध्वाऽऽनीतौ वणिक्सुतौ ॥ २८ ॥

हर्षेण धावमानाश्च प्रोचुर्नृपसमीपतः । तस्करौ द्वौ समानीतौ विलोक्याज्ञापय प्रभो ॥ २९ ॥

राज्ञाऽऽज्ञप्तास्ततः शीघ्रं दृढं बध्वा तु तावुभौ । स्थापितौ द्वौ महादुर्गे कारागारेऽविचारतः ॥ ३० ॥

मायया सत्यदेवस्य न श्रुतं कैस्तयोर्वचः । अतस्तयोर्धनं राज्ञा गृहीतं चन्द्रकेतुना ॥ ३१ ॥


अर्थ :
एक दिन एक चोर राजा (चन्द्रकेतु) के धनको चुराकर वहीं आया, जहाँ दोनों वणिक् स्थित थे। वह अपने पीछे दौड़ते हुए दूतोंको देखकर भयभीतचित्तसे धन वहीं छोड़कर शीघ्र ही छिप गया। इसके बाद राजाके दूत वहाँ आ गये जहाँ वह साधु वणिक् था। वहाँ राजाके धनको देखकर वे दूत उन दोनों वणिक्पुत्रोंको बाँधकर ले आये और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए राजासे बोले— “प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाये हैं, इन्हें देखकर आप आज्ञा दें।” राजाकी आज्ञासे दोनों को शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बाँधकर बिना विचार किये महान् कारागारमें डाल दिया गया। भगवान् सत्यदेवकी मायासे किसीने उन दोनोंकी बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतुने उन दोनोंका धन भी ले लिया ॥ २६–३१ ॥

तच्छापाच्च तयोर्गेहे भार्या चैवातिदुःखिता । चौरेणापहृतं सर्वं गृहे यच्च स्थितं धनम् ॥ ३२ ॥

आधिव्याधिसमायुक्ता क्षुत्पिपासातिदुःखिता । अन्नचिन्तापरा भूत्वा बभ्राम च गृहे गृहे ॥ ३३ ॥

कलावती तु कन्यापि बभ्राम प्रतिवासरम् । एकस्मिन् दिवसे याता क्षुधार्ता द्विजमन्दिरम् ॥ ३४ ॥

गत्वाऽपश्यद् व्रतं तत्र सत्यनारायणस्य च । उपविश्य कथां श्रुत्वा वरं प्रार्थितवत्यपि ॥ ३५ ॥

प्रसादभक्षणं कृत्वा ययौ रात्रौ गृहं प्रति ।


अर्थ :
भगवान् के शापसे वणिक्के घरमें उसकी भार्या भी अत्यन्त दुःखित हो गयी और उनके घरमें जो कुछ भी धन था, वह सब चोर ले गया। वह (लीलावती) शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाओंसे ग्रस्त, भूख और प्याससे दुःखी होकर अन्नकी चिन्तामें घर-घर भटकने लगी। कन्या कलावती भी प्रतिदिन भोजनके लिये इधर-उधर घूमने लगी। एक दिन भूखसे पीड़ित होकर वह एक ब्राह्मणके घर गयी। वहाँ उसने श्रीसत्यनारायणके व्रत-पूजनको देखा। वहाँ बैठकर उसने कथा सुनी और वर माँगा। तत्पश्चात् प्रसाद ग्रहण करके कुछ रात होनेपर अपने घर लौट गयी ॥ ३२–३५ ॥

माता कलावतीं कन्यां कथयामास प्रेमतः । पुत्रि रात्रौ स्थिता कुत्र किं ते मनसि वर्तते ॥ ३६ ॥

कन्या कलावती प्राह मातरं प्रति सत्वरम् । द्विजालये व्रतं मातर्दृष्टं वाञ्छितसिद्धिदम् ॥ ३७ ॥

तच्छ्रुत्वा कन्यकावाक्यं व्रतं कर्तुं समुद्यता । सा मुदा तु वणिग्भार्या सत्यनारायणस्य च ॥ ३८ ॥

व्रतं चक्रे सैव साध्वी बन्धुभिः स्वजनैः सह । भर्तृजामातरौ क्षिप्रमागच्छेतां स्वमाश्रमम् ॥ ३९ ॥

अपराधं च मे भर्तुर्जामातुः क्षन्तुमर्हसि । व्रतेनानेन तुष्टोऽसौ सत्यनारायणः पुनः ॥ ४० ॥

दर्शयामास स्वप्नं हि चन्द्रकेतुं नृपोत्तमम् । वन्दिनौ मोचय प्रातर्वणिजौ नृपसत्तम ॥ ४१ ॥

देयं धनं च तत्सर्वं गृहीतं यत् त्वयाऽधुना । नो चेत् त्वां नाशयिष्यामि सराज्यधनपुत्रकम् ॥ ४२ ॥


अर्थ :
माता (लीलावती) ने कलावती कन्यासे प्रेमपूर्वक पूछा— “पुत्रि! रातमें तू कहाँ रुक गयी थी? तुम्हारे मनमें क्या है?” कलावती ने तुरंत मातासे कहा— “माँ! मैंने एक ब्राह्मणके घरमें मनोरथ प्रदान करनेवाला व्रत देखा है।” कन्याके ये वचन सुनकर वणिक्की भार्या व्रत करनेको उद्यत हुई और प्रसन्नमनसे उस साध्वीने बन्धु-बान्धवोंके साथ भगवान् श्रीसत्यनारायणका व्रत किया तथा प्रार्थना की— “भगवन्! आप हमारे पति एवं जामाताके अपराधको क्षमा करें, वे दोनों शीघ्र अपने घर आ जायें।” इस व्रतसे भगवान् सत्यनारायण पुनः संतुष्ट हो गये और उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतुको स्वप्न दिखाया तथा कहा— “नृपश्रेष्ठ! प्रातःकाल दोनों वणिकोंको छोड़ दो और वह सारा धन भी लौटा दो जो तुमने उनसे ले लिया है; अन्यथा राज्य, धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूँगा।” ॥ ३६–४२ ॥

एवमाभाष्य राजानं ध्यानगम्योऽभवत् प्रभुः । ततः प्रभातसमये राजा च स्वजनैः सह ॥ ४३ ॥

उपविश्य सभामध्ये प्राह स्वप्नं जनं प्रति । बद्धौ महाजनौ शीघ्रं मोचय द्वौ वणिक्सुतौ ॥ ४४ ॥

इति राज्ञो वचः श्रुत्वा मोचयित्वा महाजनौ । समानीय नृपस्याग्रे प्राहुस्ते विनयान्विताः ॥ ४५ ॥

आनीतौ द्वौ वणिक्पुत्रौ मुक्तौ निगडबन्धनात् । ततो महाजनौ नत्वा चन्द्रकेतुं नृपोत्तमम् ॥ ४६ ॥

स्मरन्तौ पूर्ववृत्तान्तं नोचतुर्भयविह्वलौ । राजा वणिक्सुतौ वीक्ष्य वचः प्रोवाच सादरम् ॥ ४७ ॥


अर्थ :
राजासे स्वप्नमें ऐसा कहकर भगवान् सत्यनारायण अन्तर्धान हो गये। इसके अनन्तर प्रातःकाल राजा अपने सभासदोंके साथ सभाके मध्य बैठा और लोगोंको अपना स्वप्न सुनाते हुए बोला— “दोनों बंदी वणिक्पुत्रोंको शीघ्र मुक्त कर दो।” राजाकी आज्ञा सुनकर राजपुरुषों ने दोनों महाजनोंको बन्धनमुक्त करके राजाके सामने लाकर विनयपूर्वक कहा— “महाराज! बेड़ी-बन्धनसे मुक्त करके दोनों वणिक्पुत्र उपस्थित किये गये हैं।” इसके बाद दोनों महाजन (वणिक्पुत्र) नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतुको प्रणाम करके अपने पूर्ववृत्तान्तका स्मरण करते हुए भयविह्वल हो गये और कुछ भी न बोल सके। तब राजा ने वणिक्पुत्रोंको देखकर आदरपूर्वक कहा ॥ ४३–४७ ॥

दैवात् प्राप्तं महदुःखमिदानीं नास्ति वै भयम् । तदा निगडसंत्यागं क्षौरकर्माद्यकारयत् ॥ ४८ ॥

वस्त्रालङ्कारकं दत्त्वा परितोष्य नृपश्च तौ । पुरस्कृत्य वणिक्पुत्रौ वचसाऽतोषयद् भृशम् ॥ ४९ ॥

पुरानीतं तु यद् द्रव्यं द्विगुणीकृत्य दत्तवान् । प्रोवाच च ततो राजा गच्छ साधो निजाश्रमम् ॥ ५० ॥

राजानं प्रणिपत्याह गन्तव्यं त्वत्प्रसादतः । इत्युक्त्वा तौ महावैश्यौ जग्मतुः स्वगृहं प्रति ॥ ५१ ॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायणव्रतकथायां तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥


अर्थ :
आप लोगोंको प्रारब्धवश यह महान् दुःख प्राप्त हुआ है, अब कोई भय नहीं है”— ऐसा कहकर राजाने उनकी बेड़ियाँ खुलवाकर क्षौरकर्म आदि कराया। वस्त्र और आभूषण देकर उन दोनों वणिक्पुत्रोंको संतुष्ट किया तथा मधुर वचनोंसे अत्यन्त प्रसन्न किया। पहले जो धन लिया गया था, उसे दुगुना करके लौटा दिया। इसके बाद राजा ने कहा— “साधो! अब आप अपने घर जायें।” राजाको प्रणाम करके “आपकी कृपासे हम जा रहे हैं”— ऐसा कहकर वे दोनों महावैश्य अपने घरकी ओर प्रस्थान कर गये ॥ ४८–५१ ॥



॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके अन्तर्गत रेवाखण्डमें
श्रीसत्यनारायणव्रतकथाका यह तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

चौथा अध्याय

असत्य भाषण तथा भगवान् के प्रसादकी अवहेलनाका परिणाम
सूत उवाच

यात्रां तु कृतवान् साधुर्मङ्गलायनपूर्विकाम् । ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा तदा तु नगरं ययौ ॥ १ ॥

कियद् दूरे गते साधौ सत्यनारायणः प्रभुः । जिज्ञासां कृतवान् साधो किमस्ति तव नौस्थितम् ॥ २ ॥

ततो महाजनौ मत्तौ हेलया च प्रहस्य वै । कथं पृच्छसि भो दण्डिन् मुद्रां नेतुं किमिच्छसि ॥ ३ ॥

लतापत्रादिकं चैव वर्तते तरणौ मम । निष्ठुरं च वचः श्रुत्वा सत्यं भवतु ते वचः ॥ ४ ॥

एवमुक्त्वा गतः शीघ्रं दण्डी तस्य समीपतः । कियद् दूरे ततो गत्वा स्थितः सिन्धुसमीपतः ॥ ५ ॥


अर्थ :
श्रीसूतजी बोले— साधु (वणिक्) मङ्गलाचरण करके तथा ब्राह्मणोंको धन देकर अपने नगरके लिये चल पड़ा। साधुके कुछ दूर जानेपर भगवान् श्रीसत्यनारायणको उसकी सत्यताकी परीक्षा करनेकी इच्छा हुई और उन्होंने पूछा— “साधो! तुम्हारी नावमें क्या भरा है?” तब धनके मदमें चूर दोनों महाजनोंने उपहासपूर्वक कहा— “दण्डिन्! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ द्रव्य लेनेकी इच्छा है? हमारी नावमें तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।” उनकी यह निष्ठुर वाणी सुनकर भगवान् ने कहा— “तुम्हारी बात सत्य हो जाय।” ऐसा कहकर दण्डी संन्यासीका रूप धारण किये हुए भगवान् कुछ दूर जाकर समुद्रके समीप बैठ गये ॥ १–५ ॥

गते दण्डिनि साधुश्च कृतनित्यक्रियस्तदा । उत्थितां तरणीं दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययौ ॥ ६ ॥

दृष्ट्वा लतादिकं चैव मूच्छितो न्यपतद् भुवि । लब्धसंज्ञो वणिक्पुत्रस्ततश्चिन्तान्वितोऽभवत् ॥ ७ ॥

तदा तु दुहितुः कान्तो वचनं चेदमब्रवीत् । किमर्थं क्रियते शोकः शापो दत्तश्च दण्डिना ॥ ८ ॥

शक्यते तेन सर्वं हि कर्तुं चात्र न संशयः । अतस्तच्छरणं यामो वाञ्छितार्थो भविष्यति ॥ ९ ॥

जामातुर्वचनं श्रुत्वा तत्सकाशं गतस्तदा । दृष्ट्वा च दण्डिनं भक्त्या नत्वा प्रोवाच सादरम् ॥ १० ॥

क्षमस्व चापराधं मे यदुक्तं तव सन्निधौ । एवं पुनः पुनर्नत्वा महाशोकाकुलोऽभवत् ॥ ११ ॥


अर्थ :
दण्डीके चले जानेपर नित्यक्रिया करनेके पश्चात् जलमें ऊपर उठी हुई नौकाको देखकर साधु (वणिक्) अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गया। नावमें लता और पत्ते आदिको देखकर वह मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। चेतना आनेपर वणिक्पुत्र अत्यन्त चिन्तित हो गया। तब उसके दामादने कहा— “आप शोक क्यों करते हैं? दण्डीने शाप दिया है; इस स्थितिमें वे ही सब कुछ कर सकते हैं, इसमें कोई संशय नहीं। अतः उन्हींकी शरणमें चलें, वहीं हमारी मनोकामना पूर्ण होगी।” दामादके वचन सुनकर साधु वणिक् उनके पास गया और दण्डीको देखकर भक्तिपूर्वक प्रणाम कर आदरसे बोला— “आपके समक्ष मैंने जो असत्य वचन कहे हैं, उस अपराधको क्षमा करें।” ऐसा कहकर वह बार-बार प्रणाम करता हुआ महान् शोकसे व्याकुल हो गया ॥ ६–११ ॥

प्रोवाच वचनं दण्डी विलपन्तं विलोक्य च । मा रोदीः शृणु मद्वाक्यं मम पूजाबहिर्मुखः ॥ १२ ॥

ममाज्ञया च दुर्बुद्धे लब्धं दुःखं मुहुर्मुहुः । तच्छ्रुत्वा भगवद्वाक्यं स्तुतिं कर्तुं समुद्यतः ॥ १३ ॥


अर्थ :
दण्डीने उसे रोता हुआ देखकर कहा— “हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजासे विमुख रहनेके कारण और मेरी आज्ञासे ही तुमने बार-बार दुःख प्राप्त किया है।” भगवान् की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करनेके लिये उद्यत हुआ ॥ १२–१३ ॥


साधुरुवाच

त्वन्मायामोहिताः सर्वे ब्रह्माद्यास्त्रिदिवौकसः । न जानन्ति गुणान् रूपं तवाश्चर्यमिदं प्रभो ॥ १४ ॥

मूढोऽहं त्वां कथं जाने मोहितस्तव मायया । प्रसीद पूजयिष्यामि यथाविभवविस्तरैः ॥ १५ ॥

पुरा वित्तं च तत् सर्वं त्राहि मां शरणागतम् । श्रुत्वा भक्तियुतं वाक्यं परितुष्टो जनार्दनः ॥ १६ ॥


अर्थ :
साधुने कहा— “हे प्रभो! यह आश्चर्यकी बात है कि आपकी मायासे मोहित होनेके कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपको यथार्थ रूपसे नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी मायासे मोहित होकर आपको कैसे जान सकता हूँ? आप प्रसन्न हों। मैं अपनी धन-सम्पत्तिके अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मैं आपकी शरण में आया हूँ। मेरा जो पूर्वका (नौकामें स्थित) धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।” साधुकी इस भक्तियुक्त वाणीको सुनकर भगवान् जनार्दन अत्यन्त संतुष्ट हो गये ॥ १४–१६ ॥

वरं च वाञ्छितं दत्त्वा तत्रैवान्तर्दधे हरिः । ततो नावं समारुह्य दृष्ट्वा वित्तप्रपूरिताम् ॥ १७ ॥

कृपया सत्यदेवस्य सफलं वाञ्छितं मम । इत्युक्त्वा स्वजनैः सार्धं पूजां कृत्वा यथाविधि ॥ १८ ॥

हर्षेण चाभवत् पूर्णः सत्यदेवप्रसादतः । नावं संयोज्य यत्नेन स्वदेशगमनं कृतम् ॥ १९ ॥

साधुर्जामातरं प्राह पश्य रत्नपुरीं मम । दूतं च प्रेषयामास निजवित्तस्य रक्षकम् ॥ २० ॥


अर्थ :
भगवान् हरि साधुको अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। इसके पश्चात् वह साधु अपनी नौकामें चढ़ा और उसे धन-धान्यसे परिपूर्ण देखकर बोला— “भगवान् सत्यदेवकी कृपासे मेरा मनोरथ सफल हो गया।” ऐसा कहकर उसने स्वजनोंके साथ विधिवत् भगवान् की पूजा की। भगवान् श्रीसत्यनारायणकी कृपासे वह आनन्दसे परिपूर्ण हो गया और नावको सावधानीपूर्वक चलाकर अपने देशके लिये प्रस्थान किया। साधु (वणिक्) ने अपने दामादसे कहा— “देखो, मेरी रत्नपुरी नगरी दिखाई दे रही है।” इसके बाद उसने अपने धनके रक्षक दूतको अपने आगमनका समाचार देनेके लिये अपनी नगरीमें भेज दिया ॥ १७–२० ॥

ततोऽसौ नगरं गत्वा साधुभार्यां विलोक्य च । प्रोवाच वाञ्छितं वाक्यं नत्वा बद्धाञ्जलिस्तदा ॥ २१ ॥

निकटे नगरस्यैव जामात्रा सहितो वणिक् । आगतो बन्धुवर्गैश्च वित्तैश्च बहुभिर्युतः ॥ २२ ॥

श्रुत्वा दूतमुखाद् वाक्यं महाहर्षवती सती । सत्यपूजां ततः कृत्वा प्रोवाच तनुजां प्रति ॥ २३ ॥

व्रजामि शीघ्रमागच्छ साधुसंदर्शनाय च । इति मातृवचः श्रुत्वा व्रतं कृत्वा समाप्य च ॥ २४ ॥

प्रसादं च परित्यज्य गता साऽपि पतिं प्रति । तेन रुष्टः सत्यदेवो भर्तारं तरणिं तथा ॥ २५ ॥


अर्थ :
तत्पश्चात् उस दूतने नगरमें जाकर साधुकी भार्याको देखा, हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उसके लिये अभीष्ट समाचार कहा— “सेठजी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गोंके साथ बहुत अधिक धन-धान्यसे सम्पन्न होकर नगरके निकट आ गये हैं।” दूतके मुखसे यह समाचार सुनकर वह साध्वी अत्यन्त हर्षित हो गयी। उसने श्रीसत्यनारायणकी पूजा की और अपनी पुत्रीसे कहा— “मैं साधुके दर्शनके लिये जा रही हूँ, तुम शीघ्र आओ।” माताके ये वचन सुनकर कलावती ने व्रत सम्पन्न कर प्रसादका परित्याग किया और वह भी अपने पतिके दर्शनके लिये चल पड़ी। इससे भगवान् सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पतिको तथा नौकाको धनसहित जलमें डुबो दिया ॥ २१–२५ ॥

संहृत्य च धनैः सार्धं जले तस्यावमज्जयत् । ततः कलावती कन्या न विलोक्य निजं पतिम् ॥ २६ ॥

शोकेन महता तत्र रुदन्ती चापतद् भुवि । दृष्ट्वा तथाविधां नावं कन्यां च बहुदुःखिताम् ॥ २७ ॥

भीतेन मनसा साधुः किमाश्चर्यमिदं भवेत् । चिन्त्यमानाश्च ते सर्वे बभूवुस्तरिवाहकाः ॥ २८ ॥

ततो लीलावती कन्यां दृष्ट्वा सा विह्वलाऽभवत् । विललापातिदुःखेन भर्तारं चेदमब्रवीत् ॥ २९ ॥

इदानीं नौकया सार्धं कथं सोऽभूदलक्षितः । न जाने कस्य देवस्य हेलया चैव सा हृता ॥ ३० ॥

सत्यदेवस्य माहात्म्यं ज्ञातुं वा केन शक्यते । इत्युक्त्वा विललापैव ततश्च स्वजनैः सह ॥ ३१ ॥


अर्थ :
इसके बाद धनसहित नौकाको जलमें डुबो दिये जानेपर कलावती कन्या अपने पतिको न देखकर महान् शोकसे रुदन करती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी। नौकाके अदर्शन तथा कन्याको अत्यन्त दुःखी देखकर साधु (वणिक्) भयभीत मनसे सोचने लगा— “यह क्या आश्चर्य हो गया?” नावके संचालन करनेवाले सभी लोग भी चिन्तित हो गये। तत्पश्चात् लीलावती अपनी कन्याको देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुःखसे विलाप करती हुई अपने पतिसे बोली— “अभी-अभी नौकाके साथ वह (दामाद) कैसे अलक्षित हो गया? न जाने किस देवताकी उपेक्षासे वह नौका हरण कर ली गयी; अथवा श्रीसत्यनारायणके माहात्म्यको कौन जान सकता है!” ऐसा कहकर वह स्वजनोंके साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्याको गोदमें लेकर रोने लगी ॥ २६–३१ ॥

ततो लीलावती कन्यां क्रोडे कृत्वा रुरोद ह । ततः कलावती कन्या नष्टे स्वामिनि दुःखिता ॥ ३२ ॥

गृहीत्वा पादुके तस्यानुगन्तुं च मनोदधे । कन्यायाश्चरितं दृष्ट्वा सभार्यः सज्जनो वणिक् ॥ ३३ ॥

अतिशोकेन संतप्तश्चिन्तयामास धर्मवित् । हृतं वा सत्यदेवेन भ्रान्तोऽहं सत्यमायया ॥ ३४ ॥

सत्यपूजां करिष्यामि यथाविभवविस्तरैः । इति सर्वान् समाहूय कथयित्वा मनोरथम् ॥ ३५ ॥

नत्वा च दण्डवद् भूमौ सत्यदेवं पुनः पुनः । ततस्तुष्टः सत्यदेवो दीनानां परिपालकः ॥ ३६ ॥

जगाद वचनं चैनं कृपया भक्तवत्सलः । त्यक्त्वा प्रसादं ते कन्या पतिं द्रष्टुं समागता ॥ ३७ ॥

अतोऽदृष्टोऽभवत् तस्याः कन्यकायाः पतिर्ध्रुवम् । गृहं गत्वा प्रसादं च भुक्त्वा साऽऽयाति चेत् पुनः ॥ ३८ ॥


अर्थ :
इसके बाद लीलावती ने कन्याको गोदमें लेकर रोना प्रारम्भ किया। पतिके नष्ट हो जानेसे कलावती कन्या अत्यन्त दुःखी हो गयी और पतिकी पादुकाएँ लेकर उनका अनुगमन करनेका निश्चय करने लगी। कन्याके इस प्रकारके आचरणको देखकर धर्मज्ञ साधु वणिक् पत्नी सहित अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और विचार करने लगा— “या तो भगवान् सत्यनारायणने दामाद सहित धन-धान्यसे भरी नौकाको हरण कर लिया है, अथवा हम सभी भगवान् सत्यदेवकी मायासे मोहित हो गये हैं।” ऐसा विचार कर उसने सबको बुलाकर कहा— “मैं अपनी धन-शक्तिके अनुसार भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करूँगा।” ऐसा कहकर उसने बार-बार भूमि पर दण्डवत् प्रणाम किया। इससे दीनोंके रक्षक भगवान् सत्यदेव प्रसन्न हो गये। भक्तवत्सल भगवान् ने कृपापूर्वक कहा— “तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पतिको देखने चली आयी है; इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि वह घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके फिर आये, तो निश्चय ही तुम्हारी कन्या अपने पतिको प्राप्त करेगी— इसमें कोई संशय नहीं।” ॥ ३२–३८ ॥

लब्धभत्र सुता साधो भविष्यति न संशयः । कन्यका तादृशं वाक्यं श्रुत्वा गगनमण्डलात् ॥ ३९ ॥

क्षिप्रं तदा गृहं गत्वा प्रसादं च बुभोज सा । पश्चात् सा पुनरागत्य ददर्श स्वजनं पतिम् ॥ ४० ॥

ततः कलावती कन्या जगाद पितरं प्रति । इदानीं च गृहं याहि विलम्बं कुरुषे कथम् ॥ ४१ ॥

तच्छ्रुत्वा कन्यकावाक्यं संतुष्टोऽभूद् वणिक्सुतः । पूजनं सत्यदेवस्य कृत्वा विधिविधानतः ॥ ४२ ॥

धनैर्बन्धुगणैः सार्धं जगाम निजमन्दिरम् । पौर्णमास्यां च संक्रान्तौ कृतवान् सत्यस्य पूजनम् ॥ ४३ ॥

इहलोके सुखं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ ॥ ४४ ॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायणव्रतकथायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥


अर्थ :
आकाशमण्डलसे ऐसी वाणी सुनकर कन्या कलावती शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। इसके बाद लौटकर उसने अपने स्वजनों तथा अपने पतिको देखा। तब कलावती ने अपने पितासे कहा— “अब घर चलिये, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?” कन्याके वचन सुनकर वणिक्पुत्र अत्यन्त संतुष्ट हुआ और विधि-विधानसे भगवान् श्रीसत्यनारायणका पूजन किया। तत्पश्चात् वह धन तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ अपने घर गया और पूर्णिमा एवं संक्रान्ति पर्वोंपर सत्यनारायणका व्रत-पूजन करता रहा। इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें वह सत्यपुर (वैकुण्ठलोक) को प्राप्त हुआ ॥ ३९–४४ ॥



॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके अन्तर्गत रेवाखण्डमें
श्रीसत्यनारायणव्रतकथाका यह चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

पाँचवाँ अध्याय

राजा तुङ्गध्वज और गोपगणोंकी कथा
सूत उवाच

अथान्यच्च प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं मुनिसत्तमाः । आसीत् तुङ्गध्वजो राजा प्रजापालनतत्परः ॥ १ ॥

प्रसादं सत्यदेवस्य त्यक्त्वा दुःखमवाप सः । एकदा स वनं गत्वा हत्वा बहुविधान् पशून् ॥ २ ॥

आगत्य वटमूलं च दृष्ट्वा सत्यस्य पूजनम् । गोपाः कुर्वन्ति संतुष्टा भक्तियुक्ताः सबान्धवाः ॥ ३ ॥

राजा दृष्ट्वा तु दर्पेण न गतो न ननाम सः । ततो गोपगणाः सर्वे प्रसादं नृपसंनिधौ ॥ ४ ॥

संस्थाप्य पुनरागत्य भुक्त्वा सर्वे यथेप्सितम् । ततः प्रसादं संत्यज्य राजा दुःखमवाप सः ॥ ५ ॥


अर्थ :
श्रीसूतजी बोले— श्रेष्ठ मुनियो! अब इसके बाद मैं दूसरी कथा कहूँगा, आप लोग सुनें। अपनी प्रजाका पालन करनेमें तत्पर तुङ्गध्वज नामका एक राजा था। उसने भगवान् सत्यदेवके प्रसादका परित्याग करके दुःख प्राप्त किया। एक बार वह वनमें जाकर अनेक प्रकारके पशुओंका शिकार करके वटवृक्षके नीचे आया। वहाँ उसने देखा कि गोपगण अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ संतुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान् सत्यदेवकी पूजा कर रहे हैं। यह देखकर भी राजा अहंकारवश न तो वहाँ गया और न ही भगवान् सत्यनारायणको प्रणाम किया। इसके पश्चात् गोपगण पूजनके अनन्तर भगवान्का प्रसाद राजाके समीप रखकर लौट आये और इच्छानुसार सभीने प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजाने प्रसादका त्याग करनेसे भारी दुःख भोगा ॥ १–५ ॥

तस्य पुत्रशतं नष्टं धनधान्यादिकं च यत् । सत्यदेवेन तत्सर्वं नाशितं मम निश्चितम् ॥ ६ ॥

अतस्तत्रैव गच्छामि यत्र देवस्य पूजनम् । मनसा तु विनिश्चित्य ययौ गोपालसन्निधौ ॥ ७ ॥

ततोऽसौ सत्यदेवस्य पूजां गोपगणैः सह । भक्तिश्रद्धान्वितो भूत्वा चकार विधिना नृपः ॥ ८ ॥

सत्यदेवप्रसादेन धनपुत्रान्वितोऽभवत् । इहलोके सुखं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ ॥ ९ ॥


अर्थ :
उसका सम्पूर्ण धन-धान्य तथा सौ पुत्र नष्ट हो गये। तब राजाने मनमें यह निश्चय किया कि निश्चय ही भगवान् सत्यनारायणने यह सब नष्ट किया है। इसलिए वह वहीं जानेका निश्चय करके चला, जहाँ भगवान् सत्यनारायणका पूजन हो रहा था। ऐसा विचार कर राजा गोपगणोंके समीप गया और उनके साथ भक्ति तथा श्रद्धासे युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान् सत्यदेवकी पूजा की। भगवान् सत्यदेवकी कृपासे वह पुनः धन और पुत्रोंसे सम्पन्न हो गया तथा इस लोकमें सभी सुखोंका उपभोग कर अन्तमें सत्यपुर (वैकुण्ठलोक) को प्राप्त हुआ ॥ ६–९ ॥

य इदं कुरुते सत्यव्रतं परमदुर्लभम् । शृणोति च कथां पुण्यां भक्तियुक्तः फलप्रदाम् ॥ १० ॥

धनधान्यादिकं तस्य भवेत् सत्यप्रसादतः । दरिद्रो लभते वित्तं बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ ११ ॥

भीतो भयात् प्रमुच्येत सत्यमेव न संशयः । ईप्सितं च फलं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं व्रजेत् ॥ १२ ॥

इति वः कथितं विप्राः सत्यनारायणव्रतम् । यत् कृत्वा सर्वदुःखेभ्यो मुक्तो भवति मानवः ॥ १३ ॥


अर्थ :
श्रीसूतजी कहते हैं— जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्रीसत्यनारायणके व्रतको करता है और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी भगवान्‌की कथाको भक्तियुक्त होकर सुनता है, उसे भगवान् सत्यनारायणकी कृपासे धन-धान्य आदिकी प्राप्ति होती है। दरिद्र धनवान् हो जाता है, बन्धनमें पड़ा हुआ बन्धनसे मुक्त हो जाता है और भयभीत व्यक्ति भयसे मुक्त हो जाता है— यह पूर्णतः सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं। इस लोकमें सभी इच्छित फलोंका भोग करके अन्तमें वह सत्यपुर (वैकुण्ठलोक) को प्राप्त होता है। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे भगवान् सत्यनारायणके व्रतका वर्णन किया है, जिसे करनेसे मनुष्य सभी दुःखोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १०–१३ ॥

विशेषतः कलियुगे सत्यपूजा फलप्रदा । केचित् कालं वदिष्यन्ति सत्यमीशं तमेव च ॥ १४ ॥

सत्यनारायणं केचित् सत्यदेवं तथापरे । नानारूपधरो भूत्वा सर्वेषामीप्सितप्रदम् ॥ १५ ॥

भविष्यति कलौ सत्यव्रतरूपी सनातनः । श्रीविष्णुना धृतं रूपं सर्वेषामीप्सितप्रदम् ॥ १६ ॥

य इदं पठते नित्यं शृणोति मुनिसत्तमाः । तस्य नश्यन्ति पापानि सत्यदेवप्रसादतः ॥ १७ ॥

व्रतं यैस्तु कृतं पूर्वं सत्यनारायणस्य च । तेषां त्वपरजन्मानि कथयामि मुनीश्वराः ॥ १८ ॥


अर्थ :
कलियुगमें भगवान् सत्यदेवकी पूजा विशेष रूपसे फल प्रदान करनेवाली है। भगवान् विष्णुको ही कोई काल, कोई सत्य, कोई ईश, कोई सत्यदेव और कोई सत्यनारायण नामसे कहेगा। अनेक रूप धारण करके भगवान् सत्यनारायण सभी प्राणियोंके मनोरथ पूर्ण करते हैं। कलियुगमें सनातन भगवान् विष्णु ही सत्यव्रतके रूपमें अवतीर्ण होकर सभीकी मनोकामनाएँ पूर्ण करेंगे। हे श्रेष्ठ मुनियो! जो व्यक्ति नित्य भगवान् सत्यनारायणकी इस व्रतकथाको पढ़ता या सुनता है, भगवान् सत्यनारायणकी कृपासे उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरो! जिन्होंने पूर्वकालमें भगवान् सत्यनारायणका व्रत किया है, उनके अगले जन्मका वृत्तान्त अब मैं कहूँगा— आप लोग सुनें ॥ १४–१८ ॥

शतानन्दो महाप्राज्ञः सुदामा ब्राह्मणो ह्यभूत् । तस्मिञ्जन्मनि श्रीकृष्णं ध्यात्वा मोक्षमवाप ह ॥ १९ ॥

काष्ठभारवहो भिल्लो गुहराजो बभूव ह । तस्मिञ्जन्मनि श्रीरामं सेव्य मोक्षं जगाम वै ॥ २० ॥

उल्कामुखो महाराजो नृपो दशरथोऽभवत् । श्रीरङ्गनाथं सम्पूज्य श्रीवैकुण्ठं तदागमत् ॥ २१ ॥

धार्मिकः सत्यसन्धश्च साधुर्मोरध्वजोऽभवत् । देहार्धं क्रकचैश्छित्त्वा दत्त्वा मोक्षमवाप ह ॥ २२ ॥

तुङ्गध्वजो महाराजः स्वायम्भुवोऽभवत् किल । सर्वान् भागवतान् कृत्वा श्रीवैकुण्ठं तदाऽगमत् ॥ २३ ॥

भूत्वा गोपाश्च ते सर्वे व्रजमण्डलवासिनः । निहत्य राक्षसान् सर्वान् गोलोकं तु तदा ययुः ॥ २४ ॥


अर्थ :
महान् प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नामके ब्राह्मण सत्यनारायणव्रतके प्रभावसे अगले जन्ममें सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्ममें भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करके मोक्षको प्राप्त हुए। लकड़हारा भिल्ल अगले जन्ममें गुहोंका राजा हुआ और भगवान् श्रीरामकी सेवा करके मोक्षको प्राप्त हुआ। महाराज उल्कामुख अगले जन्ममें राजा दशरथ बने और श्रीरङ्गनाथकी पूजा करके अन्तमें वैकुण्ठलोकको प्राप्त हुए। इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु अगले जन्ममें मोरध्वज राजा बने और आरेसे अपने पुत्रकी आधी देह भगवान् विष्णुको अर्पित कर मोक्षको प्राप्त किया। महाराज तुङ्गध्वज अगले जन्ममें स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी समस्त कर्तव्योंका पालन करके वैकुण्ठलोक पहुँचे। जो गोपगण थे, वे अगले जन्ममें व्रजमण्डलवासी गोप बने और राक्षसोंका संहार करके भगवान् के शाश्वत धाम गोलोकको प्राप्त हुए ॥ १९–२४ ॥


इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे
श्रीसत्यनारायणव्रतकथायां पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराणके अन्तर्गत रेवाखण्डमें
श्रीसत्यनारायणव्रतकथाका यह पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

  • पुराने

    श्री सत्यनारायण व्रतकथा

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

shastrianand701@gmail.com

एक टिप्पणी भेजें (0)
3/related/default