वन्दे शिवं शंकरम् स्तोत्रम्

AnandShastri
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shri shiv stuti

श्रीशिवस्तुतिः

वन्दे देवमुमापतिं सुरगुरूं वन्दे जगत्कारणं ।
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशुनां पतिम् ।।
वन्दे सूर्यशशाङ्कवह्निनयनं वन्दे मुकुन्दप्रियं ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।।१।।
अर्थ : पार्वतीपति भगवान् शंकर को मैं प्रणाम करता हूँ , देवताओं के गुरु तथा सृष्टि के कारण रूप परमेश्वर भगवान शंकर को मैं प्रणाम करता हूँ,नागों को आभूषण के रूप में तथा हाथ में मृगमुद्रा धारण करने वाले एवं समस्त जीवों के गुरु स्वामी भगवान शंकर को मैं नमस्कार करता हूँ , नमस्कार करता हूँ । सूर्य चंद्र और अग्नि देव को नेत्र रूप में धारण करने वाले भगवान् नारायण की परम प्रिय भगवान् शंकर को मैं प्रणाम करता हूँ , भक्तजनों को आश्रय देनेवाले वरदानी कल्याणस्वरुप भगवान शंकर को मैं प्रणाम करता हूँ ।
वन्दे सर्वजगद्विहारमतुलं वन्देऽन्धकध्वंसिनं ।
वन्दे देवशिखामणिं शशिनिभं वन्दे हरेर्वल्लभम् ।।
वन्दे नागभुजङ्गभूषणधरं वन्दे शिवं चिन्मयं ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।।२।।
अर्थ :जिनके विहार की पूरे विश्व में कोई तुलना नहीं हैं, ऐसे अतुलनीय विहारी भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । अन्धकासुरके हन्ता भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । जो सभी देवताओं के शिरोमणि हैं , जिनकी कान्ति चन्द्रमाके समान हैं , जिन्होनें अपने शरिरपर नागों और सर्पोंको आभूषणके रूपमें धरण कर रखा हैं , और जो भगवान् विष्णुको अत्यन्त प्रिय अपने भक्त-जनों को आश्रय देनेवाले है, ऐसे वरदानी परम कल्याणस्वरूप चिदानन्द भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ।।
वन्दे दिव्यमचिन्त्यमद्वयमहं वन्देऽर्कदर्पापहं ।
वन्दे निर्मलमादिमूलमनिशं वन्दे मखध्वंसिनम् ।।
वन्दे सत्यमनन्तमाद्यमभयं वन्देऽतिशान्ताकृतिं ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।।३।।
अर्थ :अचिन्त्य शक्तिसे समपन्न , दिव्य लोकोत्तर , अद्वय ब्रह्मस्वरूप भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ । सूर्य के अभिमान का दमन करनेवाले तथा शान्त आकृतिवाले , सत्यस्वरूप , अनन्तस्वरूप , आद्यस्वरूप , और सदा निर्भय रहनेवाले एवं भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले हैं , ऐसे वरदानी क्ल्याणस्वरूप भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ।।
वन्दे भूरथमम्बुजाक्षविशिखं वन्दे श्रुतित्रोटकं ।
वन्दे शैलशरासनं फणिगुणं वन्देऽधितूणीरकम् ।।
वन्दे पद्मजसारथिं पुरहरं वन्दे महाभैरवं ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।।४।।
अर्थ :त्रिपुरासुरको दग्ध करनेके लिये पृथ्वीको रथ , ब्रह्माको सारथि , सुमेरू पर्वतको धनुष , श्रुतिको त्रोटक , शेषनाग को प्रत्यंचा , आकाशको तूणीर और कमलनयन भगवान् विष्णुको बाण बनानेवाले , महाभैरव रूपधारी , भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले तथा वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान् शङ्करको मैं प्रणाम करता हूँ ।।
वन्दे पञ्चमुखाम्बुजं त्रिनयनं वन्दे ललाटेक्षणं ।
वन्दे व्योमगतं जटासुमुकुटं चन्द्रर्धगङ्गाधरम् ।।
वन्दे भस्मकृतत्रिपुण्ड्रजटिलं वन्देष्टमूर्त्यात्मकं ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।।५।।
अर्थ :जो पाँच मुखवाले हैं तथा जो अघोर, सद्योजात, तत्पुरुष, वामदेव और ईशानसंज्ञक हैं, उन कमलके समान मुखवाले भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके तीन नेत्र हैं, जिनका अग्निरूप नेत्र ललाटमें है, ऐसे भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। अपने मस्तकपर भगवती गंगा और अर्ध चन्द्रमाको तथा सिरपर मुकुटके रूपमें सुन्दर जटाको धारण किये हैं, ऐसे आकाशकी तरह व्यापक भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन भगवान् शंकरकी पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, यजमान, सूर्य और चन्द्र मतान्तरसे शर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव नामक आठ मूर्तियाँ हैं, ऐसे उन भस्मनिर्मित त्रिपुण्ड्रको जटाके रूपमें धारण करनेवाले भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो भक्त जनोंके आश्रयदाता हैं, उन वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५ ॥
वन्दे कालहरं हरं विषधरं वन्दे मृडं धूर्जटिं ।
वन्दे सर्वगतं दयामृतनिधिं वन्दे नृसिंहापहम् ।।
वन्दे विप्रसुरार्चिताङ्घ्रिकमलं वन्दे भगाक्षापहं ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।।६।।
अर्थ : जो कालको जीतनेवाले, पापका हरण करनेवाले, कण्ठमें विषको धारण करनेवाले, सुख देनेवाले तथा जटामें गंगाजीको धारण करनेवाले व्यापक, दयारूपी अमृतके निधि हैं और शरभरूप धारणकर नृसिंहको लेकर आकाशमें उड़ जानेवाले हैं एवं जिनके चरणकमलोंकी वन्दना ब्राह्मण एवं देवता भी करते हैं, जिन्होंने भगाक्ष (इन्द्र) के दुःखका निवारण किया है तथा जो भक्तोंको आश्रय देनेवाले और वरदानी हैं, ऐसे उन कल्याणस्वरूप भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६ ॥
वन्दे मङ्गलराजताद्रिनिलयं वन्दे सुराधीश्वरं ।
वन्दे शङ्करमप्रमेयमतुलं वन्दे यमद्वेषिणम् ।।
वन्दे कुण्डलिराजकुण्डलधरं वन्दे सहस्राननं ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥७॥
अर्थ :जो चाँदीके समान शुभ्र एवं मांगलिक हिमालय पर्वतपर रहते हैं, जो सहस्र (अनन्त)-मुखवाले हैं, जो सभी देवताओंके स्वामी हैं, जो कल्याण करनेवाले, अप्रमेय और अतुलनीय हैं एवं शेषनागको जिन्होंने कानोंका कुण्डल बनाया है, यमको पराजित किया है, भक्त-जनोंको आश्रय देनेवाले वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥
वन्दे हंसमतीन्द्रियं स्मरहरं वन्दे विरूपेक्षणं ।
वन्दे भूतगणेशमव्ययमहं वन्देऽर्थराज्यप्रदम् ।।
वन्दे सुन्दरसौरभेयगमनं वन्दे त्रिशूलायुधं ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥८॥
अर्थ :जो सूर्यस्वरूप और इन्द्रियोंसे परे हैं, जो कामदेवको भस्म करनेवाले हैं, जो तीन नेत्र होनेके कारण विरूपाक्ष कहे गये हैं, जो सर्वथा अविनाशी हैं, जो धन और राज्यके प्रदाता हैं तथा भूतगणोंके स्वामी हैं, जो सुन्दर वृषवाहनपर आरूढ़ होकर चलते हैं, त्रिशूल ही जिनका आयुध है, ऐसे जो भक्त जनोंको आश्रय देनेवाले वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान् शंकर हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ८ ॥
वन्दे सूक्ष्ममनन्तमाद्यमभयं वन्देऽन्धकारापहं ।
वन्दे फूलननन्दिभृङ्गिविनतं वन्दे सुपर्णावृतम् ।।
वन्दे शैलसुतार्धभागवपुषं वन्देऽभयं त्र्यम्बकं ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ ९ ॥
अर्थ :उन महाशिवको प्रणाम है जो सूक्ष्म हैं, अनन्त हैं, जो सबके आद्य हैं और जो निर्भीक हैं; जिन्होंने अन्धकासुरका वध किया है, जिन्हें फूलन, नन्दी और भृंगी प्रणाम अर्पित करते हैं, जो सुपर्णाओं (कमलिनियों) से आवृत हैं, जिनके आधे शरीरमें शैलसुता पार्वती हैं, जो भक्तोंको निर्भीक करनेवाले हैं, जिनके तीन नेत्र हैं। जो भक्त जनोंको आश्रय देनेवाले एवं वरदानी हैं, ऐसे कल्याणस्वरूप भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९ ॥
वन्दे पावनमम्बरात्मविभवं वन्दे महेन्द्रेश्वरं ।
वन्दे भक्तजनाश्रयामरतरुं वन्दे नताभीष्टदम् ॥
वन्दे जनुसुताम्बिकेशमनिशं वन्दे गणाधीश्वरं ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥ १० ॥
॥ इति श्रीशिवस्तुतिः सम्पूर्णा ॥
अर्थ :जिनका आत्मविभव परम पावन है और आकाशकी तरह व्यापक है, जो देवराज इन्द्रके भी स्वामी हैं, जो भक्तजनोंके लिये कल्पवृक्षके समान आश्रय हैं, जो प्रणाम करनेवालोंको भी अभीष्ट फल प्रदान करते हैं, जिनकी एक पत्नी गंगा और दूसरी पार्वती हैं और जो अनेक प्रमुख गणोंके भी स्वामी हैं, ऐसे भक्त जनोंको आश्रय देनेवाले वरदानी कल्याणस्वरूप भगवान् शंकरको मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ ॥ १० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीशिवस्तुति सम्पूर्ण हुई ॥

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