सन्ध्योपासन एवं तर्पण-विधि

AnandShastri
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संध्या न करने सो दोष

संध्या न करने से दोष

जिसने संध्या का ज्ञान नहीं किया,जिसने संध्या की उपासना नहीं की वह द्विज जीवितरहे, शूद्र-समा रहता है और मृत्यु के बाद कुत्ते आदि की योनि को प्राप्त करता हैं ।

संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता ।
जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते ।।

ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य आदि संध्या नहीं करें , तो वो अपवित्र है और उन्हे किसी पुण्यकर्म के करने का फल प्राप्त नहीं होता ।

संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु ।
यदन्यत् कुरूते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत् ।।

सूर्य और तारों से रहित दिन-रात की संधि को तत्वदर्शी मुनियों ने संध्याकाल माना है--

अहोरात्रस्य या संधिः सूर्यनक्षत्रवर्जिता ।
सा तु संध्या समाख्याता मुनिभिस तत्वदर्शिभिः ।।

संध्यास्तुति

ब्राह्मणरूपी वृक्ष का मूल संध्या हैं,चारो वेद,चार शाखाएँ हैं, धर्म और कर्म पत्ते हैं । अतः मूल की रक्षा यत्न से करनी चाहिये । मूल के छिन्न हो जाने पर वृक्ष और शाखा कुछ भी नहीं रह सकते ।

विप्रो वृक्षो मूलकान्यत संध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् ।
तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव वृक्षो न शाखा ।।

समय पर की गयी संध्या इच्छानुसार फल देती है, और बिना समय की,की गयी संध्या वन्ध्या स्त्री के समान होती हैं ।

स्वकाले सेविता संध्या नित्यं कामदुधा भवेत् ।
अकाले सेविता सा च संध्या वन्ध्या वधूरिव ।।

प्रातः काल में तारों के रहते हुए मध्याह्नकाल में जब सूर्य आकाश के मध्य में हों, सायंकाल में सूर्यास्त के पहले ही इस तरह तीन प्रकार की संध्या करनी चाहिये ।

प्रातः संध्या सनक्षत्रां मध्याह्ने मध्यभास्कराम् ।
ससूर्या पश्चिमां संध्यां तिस्त्रः संध्या उपासते ।।

सायंकाल में पश्चिम की तरफ मुहँ करके जब तक तारों का उदय न हो और प्रातःकाल में पूर्व की ओर मुख करके जब तक सूर्य का दर्शन न हो तब तक जप करते रहें ।

जपन्नासीत सावित्रीम्प्रत्यगातार कोदयात् ।
संध्या प्राक् प्रातरेवं हि तिष्ठदासूर्यदर्शनात् ।।

गृहस्थ तथा ब्रह्मचारी गायत्री के आदि में 'ॐ' जप करें, और अन्त में 'ॐ’ का उच्चारण न करें क्योकिं ऐसा करने से सिद्धि नहीं होती है ।

गृहस्थो ब्रह्मचारी च प्रणवाद्यामिमां जपेत् ।
अन्ते यः प्रणवं कुर्यान्नासौ सिद्धिम वाप्नुयात् ।।

( याज्ञवल्क्य स्मृ. आचाराध्याय २४/२५ बालम्भट्टी ) जपके आदि में चौंसठ कलायुक्त विद्याओं तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का सिद्धिदायक गायत्री -हृदय का तथा अन्त में गायत्री-कनच का पाठ करें । ( यह नित्य-संध्या में आवश्यक नहीं हैं, करे तो अच्छा हैं ।। )

चतुष्षष्टिकला विद्या सकलैश्वर्यसिद्धिदा ।
जपारम्भे च हृदयं जपान्ते कवचं पठेत् ।।

घर में संध्या वन्दन करने से एक, गो-स्थान में सौ, नदी किनारे लाख तथा शिव के समीप में अनन्त गुना फल होता है ।

गृहेषु तत्समा संध्या गोष्ठे शतगुणा स्मृता ।
नद्यां शतगुणा प्रोक्ता अनन्ता शिवसंनिधौ ।।

पैर धोने से पीने से और संध्या करने से बचा हुआ जल श्वान के मूत्र के समान हो जाता है, उसे पीने पर चन्द्रायण-व्रत करने से मनुष्य पवित्र होता है । इसलिए बचे हुए जल को फेंक दें ।

पादशेषं पीतशेषं संध्याशेषं तथैव च ।
शनो मूत्र समं तोयं पित्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।

पवित्रीकरणम्

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थाङ्गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।।

त्रिराचमनम्

ॐ केशवाय नमः ! ॐ नारायणाय नमः ! ॐ माधवाय नमः ! ॐ गोविन्दाय नमः ।।
हस्तौ प्रक्षाल्य ।।

आसनशुद्धिः

पृथ्वीतिमन्त्रस्य मेरूपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसने विनियोगः ।।
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरू चासनम् ।।

पवित्रीधारणम्

ॐ पवित्रेस्थोव्वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसवऽउत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः ।
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुनेतच्छकेयम् ।।

भस्मतिलकधारणम्

त्र्यायुषमित्यस्य नारायण ऋषिः रूद्रो देवता उष्णिक्छन्दः भस्मधारणे विनियोगः ।।
ॐ त्र्यायुषञ्जमदग्नेः ललाटे ! कश्यपस्य त्र्यायुषम् ग्रीवायाम् !
यद्देवेषु त्र्यायुषम् बाह्वोः ! तन्नोऽअस्तु त्र्यायुषम् हृदये ।।

स्वस्ति-तिलक धारणम्

ॐ स्वस्ति नऽइन्द्रोव्वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषाविश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽअरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्द्दधातु ।।

शिखाबन्धनम्

मानस्तोक इति मन्त्रस्य कुत्स ऋषिः जगती छन्दः एको रूद्रो देवता शिखाबन्धने विनियोगः ।।
ॐ मानस्तोकेतनये मानऽआयुषि मानोगोषु मानोऽअश्वेषुरीरिषः ।
मानोव्वीरान्नुद्द्रभामिनोव्वधी र्हविष्म्मन्तः सदमित्वाहवामहे ।।
चिद्रूपिणी महामाये दिव्यतेजः समन्विते ।
तिष्ठ देवि शिखाबन्धे तेजोवृद्धिं कुरूष्व मे ।।

संकल्पः

ॐ शुभे शोभनेमुहुर्ते अद्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशान्तर्गते पुण्यक्षेत्रे
कलियुगे कलिप्रथमचरणे …...सम्वत्सरे …….. मासे……..पक्षे…….तिथौ…….वासरे……...नक्षत्रे……..योगे……...
ममोपात्तदुरितक्षयार्थं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थे ब्रह्मवर्चस्वाप्तये प्रातः / मध्याह्न / सायं / संध्योपासनं करिष्ये ।।

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