वेदद्वारा श्रीराम स्तुति

AnandShastri
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वेदद्वारा श्रीरामस्तुति | Ved Dwara Shri Ram Stuti

वेदद्वारा श्रीरामस्तुति

जय सगुन निर्गुन रूप अनूप भूप सिरोमने ।
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल बल हने ।।

अर्थ : हे सगुण और निर्गुण दोनों रूपों से युक्त, अनुपम रूप वाले और राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम! आप रावण आदि प्रचंड राक्षसों तथा दुष्टों के महान बल का नाश करने वाले हैं।

अवतार नर संसार भार बिभंजि दारून दुख दहे ।
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संभुक्त सक्ति नमामहे ।।

अर्थ : आपने मनुष्य रूप में अवतार लेकर संसार के भारी बोझ और भयंकर दुखों का नाश किया है। हे शरणागतों का पालन करने वाले दयालु प्रभु! आपकी शक्ति सहित हम आपको नमस्कार करते हैं।

तव विषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे ।
भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे ।।

अर्थ : आपकी अद्भुत और कठिन माया के वश होकर देवता, असुर, नाग, मनुष्य आदि समस्त जीव जन्म-मरण के मार्ग में भटकते रहते हैं और काल, कर्म तथा गुणों से बंधे रहते हैं।

जे नाथ करि करूना बिलोके त्रिबिधि दुःख ते निर्बहे ।
भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे ।।

अर्थ : हे नाथ! जिस पर आप करुणा दृष्टि डालते हैं वह तीनों प्रकार के दुखों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से मुक्त हो जाता है। संसार के दुखों का नाश करने में समर्थ प्रभु राम हमारी रक्षा करें, उन्हें हम प्रणाम करते हैं।

जे ज्ञान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी ।
ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी ।।

अर्थ : जो लोग ज्ञान और अहंकार के मद में चूर होकर आपकी संसार से पार करने वाली भक्ति का आदर नहीं करते, वे देवताओं को भी दुर्लभ पद पाकर भी अंत में गिर जाते हैं — ऐसा हम देखते हैं।

विस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे ।
जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे ।।

अर्थ : जो सब आशाओं को त्यागकर विश्वासपूर्वक आपके दास बन जाते हैं, वे आपके नाम का जप करके बिना कठिन परिश्रम के ही संसार सागर से पार हो जाते हैं।

जे चरन शिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनि पतिनीतरी ।
नख निर्गता मुनि बंदिता त्रैलोक पावनि सुरसरी ।।

अर्थ : जिनके चरणों की धूलि को शिव और ब्रह्मा भी पूजते हैं, उसी चरणरज के स्पर्श से गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या पवित्र हुईं और उन्हीं के नखों से प्रकट होकर गंगा जी तीनों लोकों को पवित्र करती हैं।

ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंकट किन लहे ।
पद कंज द्वंद मुकुन्द राम रमेश नित्य भजामहे ।।

अर्थ : जिनके चरणों में ध्वज, वज्र, अंकुश और कमल आदि चिन्ह शोभायमान हैं और जो वन में घूमते हुए भी भक्तों को परम सुख देते हैं, उन मुक्तिदाता श्रीराम के चरण कमलों का हम सदा भजन करते हैं।

अब्यक्तमुलमनादि तरू त्वच चारि निगमागम भने ।
षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने ।।

अर्थ : यह संसार एक ऐसे वृक्ष के समान है जिसका मूल अव्यक्त है। वेदों ने इसकी चार छालें, छह तने, पच्चीस शाखाएँ और असंख्य पत्ते और फूल बताए हैं।

फल जगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे ।
पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे ।।

अर्थ : इस संसार रूपी वृक्ष में कटु और मधुर अनेक प्रकार के फल लगे हैं। यह निरंतर नए पत्तों और फूलों से विकसित होता रहता है — ऐसे संसार वृक्ष को हम प्रणाम करते हैं।

जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं ।
ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं ।।

अर्थ : जो लोग आपको अजन्मा, अद्वैत और अनुभव से जानने योग्य ब्रह्म मानकर ध्यान करते हैं, हे नाथ! हम तो आपके सगुण रूप का ही नित्य गुणगान करते हैं।

करूनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं ।
मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं ।।

अर्थ : हे करुणा के धाम और सद्गुणों के भंडार प्रभु! हम आपसे यही वरदान माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म के सभी दोषों को छोड़कर आपके चरणों में हमारा प्रेम बना रहे।

सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार ।
अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार ।।

अर्थ : सबके सामने वेदों ने यह विनम्र प्रार्थना की और फिर अंतर्धान होकर अपने ब्रह्मलोक को चले गए।


वेदद्वारा श्रीरामस्तुति
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ब्रह्माद्वारा श्रीरामस्तुति
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