अथ शुक्लयजुर्वेदीय पुरुषसूक्तम्

AnandShastri
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॥ पुरुषसूक्तम् ॥

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ १ ॥
अर्थ वह विराट पुरुष हजारों सिर, हजारों नेत्र और हजारों चरणों वाला है। वह सम्पूर्ण पृथ्वी को चारों ओर से आच्छादित करके उससे भी दस अंगुल ऊपर स्थित है।

ॐ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ २ ॥
अर्थ यह सम्पूर्ण जगत, जो हो चुका है और जो होने वाला है, वही पुरुष है। वह अमरत्व का स्वामी है और अन्न के द्वारा भी विस्तार करता है।

ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः ।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ ३ ॥
अर्थ यह सम्पूर्ण सृष्टि उसकी महिमा का केवल एक अंश है। उसका एक भाग समस्त प्राणी है, और उसके तीन भाग अमर रूप से स्वर्ग में स्थित हैं।

ॐ त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः ।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥ ४ ॥
अर्थ उस विराट पुरुष के तीन भाग ऊपर स्थित हैं और एक भाग इस लोक में प्रकट हुआ। फिर वह सभी दिशाओं में, जड़ और चेतन रूपों में, व्याप्त हो गया।

ॐ ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः ।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥ ५ ॥
अर्थ उस पुरुष से विराट उत्पन्न हुआ और विराट से पुनः पुरुष उत्पन्न हुआ। उत्पन्न होकर उसने पृथ्वी को चारों ओर से आच्छादित कर लिया।

ॐ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।
पशूंस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥ ६ ॥
अर्थ उस सर्वहुत यज्ञ से घृत और सामग्री उत्पन्न हुई। उसी से आकाश, वन और ग्रामों में रहने वाले पशु उत्पन्न हुए।

ॐ तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥ ७ ॥
अर्थ उस यज्ञ से ऋग्वेद, सामवेद, छन्द और यजुर्वेद की उत्पत्ति हुई।

ॐ तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥ ८ ॥
अर्थ उस यज्ञ से घोड़े, गायें तथा भेड़-बकरियाँ उत्पन्न हुईं।

ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः ।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ ९ ॥
अर्थ उस पुरुष को यज्ञ में आहुति बनाकर देवताओं, साध्यों और ऋषियों ने यज्ञ किया।

ॐ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।
मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा उच्येते ॥ १० ॥
अर्थ जब देवताओं ने उस पुरुष का विभाजन किया, तो उसके मुख, भुजाएँ, जंघाएँ और चरण क्या बने — ऐसा प्रश्न किया गया।

ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥ ११ ॥
अर्थ उसके मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और चरणों से शूद्र उत्पन्न हुए।

ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥ १२ ॥
अर्थ उसके मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य, कानों से वायु और मुख से अग्नि उत्पन्न हुई।

ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥ १३ ॥
अर्थ उसकी नाभि से आकाश, सिर से स्वर्ग, चरणों से पृथ्वी और कानों से दिशाएँ उत्पन्न हुईं।

ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥ १४ ॥
अर्थ देवताओं ने पुरुष को आहुति बनाकर यज्ञ किया। उस यज्ञ में वसन्त घृत, ग्रीष्म समिधा और शरद आहुति बनी।

ॐ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः ।
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥ १५ ॥
अर्थ उस यज्ञ में सात परिधियाँ और इक्कीस समिधाएँ थीं। देवताओं ने उस पुरुष को यज्ञ-पशु रूप में बाँधा।

ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ १६ ॥
अर्थ देवताओं ने यज्ञ से यज्ञ की उपासना की। यही प्रथम धर्म बने, जिनसे वे उस दिव्य लोक को प्राप्त हुए जहाँ प्राचीन देव स्थित हैं।

॥ इति श्रीपुरुषसूक्तं समाप्तम् ॥
पुरुषसूक्तम् का पाठ सृष्टि की उत्पत्ति, समाज की रचना और यज्ञ के आध्यात्मिक महत्त्व को दर्शाता है। यह सूक्त वैदिक दर्शन का मूल स्तम्भ माना जाता है।

 पुरुषसूक्तम् अर्थ सहित | Purusha Suktam in Hindi

 ऋग्वेद का पुरुषसूक्तम् शुद्ध संस्कृत पाठ और हिन्दी अर्थ सहित। सृष्टि की उत्पत्ति, विराट पुरुष और वैदिक दर्शन का सम्पूर्ण विवरण।

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