अथ श्री सूक्तम्

AnandShastri
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॥ श्री सूक्तम् ॥

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १ ॥
अर्थ हे अग्निदेव! स्वर्णवर्णा, तेजस्विनी, स्वर्ण-रजत की माला धारण करने वाली, चन्द्रमा के समान कान्तिवाली, स्वर्णमयी देवी लक्ष्मी को मेरे पास लाओ।

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥ २ ॥
अर्थ हे अग्निदेव! उस लक्ष्मी को मेरे पास लाओ जो कभी दूर न जाने वाली हो, जिनकी कृपा से मुझे धन, गौ, अश्व और उत्तम पुरुष प्राप्त हों।

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम् ।
श्रियं देवी मुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥ ३ ॥
अर्थ जिनके आगे घोड़े, बीच में रथ और जिनके आगमन से हाथियों का नाद होता है, ऐसी ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी को मैं आवाहन करता हूँ; वे मुझ पर कृपा करें।

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥ ४ ॥
अर्थ जो सौम्य मुस्कान से युक्त, स्वर्णमय आभूषणों से सुशोभित, करुणामयी, तेजस्विनी, संतुष्ट और दूसरों को तृप्त करने वाली, कमल पर विराजमान और कमलवर्णा हैं—ऐसी लक्ष्मी को मैं बुलाता हूँ।

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टा मुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥ ५ ॥
अर्थ चन्द्रमा के समान प्रकाशमान, यश से दीप्त, देवताओं द्वारा पूजित, उदार स्वभाव वाली कमलवासिनी लक्ष्मी की मैं शरण लेता हूँ। हे देवी! मेरी दरिद्रता नष्ट हो और मैं आपको स्वीकार करता हूँ।

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥ ६ ॥
अर्थ हे सूर्यवर्णा देवी! तप से उत्पन्न आपका वृक्ष बिल्व है। उसके फल मेरे भीतर और बाहर की समस्त दरिद्रता को नष्ट करें।

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥ ७ ॥
अर्थ देवों की सखी कीर्ति मणि सहित मेरे पास आए। मैं इस राष्ट्र में प्रकट होकर यश और समृद्धि प्राप्त करूँ।

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥ ८ ॥
अर्थ मैं भूख, प्यास और दरिद्रता रूपी ज्येष्ठा अलक्ष्मी का नाश करता हूँ। हे देवी! मेरे घर से सारी अशुभता और अभाव दूर करें।

गन्धद्वारा दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥ ९ ॥
अर्थ जो सुगन्ध से युक्त, अजेय, सदा पुष्ट करने वाली, समस्त प्राणियों की स्वामिनी हैं—ऐसी लक्ष्मी को मैं बुलाता हूँ।

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यं पशूनां रूपम् ।
अन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥ १० ॥
अर्थ मेरे मन की इच्छाएँ, वाणी की सत्यता, पशुओं का रूप, अन्न, यश और लक्ष्मी मुझमें स्थिर हों।

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥ ११ ॥
अर्थ हे कर्दम! तुमसे उत्पन्न प्रजा मुझमें निवास करे। कमलमालाधारिणी माता लक्ष्मी मेरे कुल में वास करें।

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥ १२ ॥
अर्थ जल तत्व मेरे घर में स्नेह और समृद्धि उत्पन्न करे। हे देवी लक्ष्मी! मेरे कुल में स्थायी रूप से निवास करें।

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १३ ॥
अर्थ हे अग्निदेव! करुणामयी, पुष्टिदायिनी, स्वर्णवर्णा, कमलमालाधारिणी, चन्द्रकान्ति लक्ष्मी को मेरे पास लाओ।

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥ १४ ॥
अर्थ हे अग्निदेव! करुणामयी, दात्री, स्वर्णमयी, हेममालाधारिणी, सूर्य के समान तेजस्विनी लक्ष्मी को मेरे पास लाओ।

तां आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥ १५ ॥
अर्थ हे अग्निदेव! कभी न जाने वाली उस लक्ष्मी को मेरे पास लाओ, जिनकी कृपा से मुझे अपार धन, गौ, सेवक, अश्व और श्रेष्ठ पुरुष प्राप्त हों।

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥ १६ ॥
अर्थ जो शुद्ध होकर नित्य घृत की आहुति देता है और इस पंद्रह ऋचाओं वाले श्रीसूक्त का जप करता है, वह निश्चित रूप से लक्ष्मी की प्राप्ति करता है।

॥ ऋग्वेदोक्तं श्रीसूक्तं सम्पूर्णम् ॥

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