॥ सुन्दरकाण्ड ॥
(रामचरितमानस – श्रीराम भक्त हनुमान जी का प्रसंग)
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं,
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरूं मायामनुष्यं हरिं ,
वन्देऽहं करूणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥ १ ॥
अर्थ —
शान्त, सनातन, अप्रमेय, निष्पाप और मोक्षरूप परम शान्ति देने वाले;ब्रह्मा, शम्भु और शेष द्वारा निरन्तर सेवित;वेदान्त से जानने योग्य, सर्वव्यापक, माया से मनुष्यरूप में प्रकट;
करुणा के सागर, रघुकुलश्रेष्ठ, राजाओं के शिरोमणि भगवान राम – जगदीश्वर को मैं वन्दन करता हूँ।
श्लोक २
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये ,
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां में ,
कामादिदोषरहितं कुरू मानसं च ॥ २ ॥
अर्थ —
हे रघुनाथ! मेरे हृदय में दूसरी कोई इच्छा नहीं है । आप सबके अन्तरात्मा हैं — यह मैं सत्य कहता हूँ । हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी पूर्ण भक्ति दीजिये और मेरे मन को काम आदि दोषों से रहित कीजिये।
॥ चौपाई ॥
जामवंत के बचन सुहाए ।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई ।
सहि दुख कंद मूल फल खाई ॥ १ ॥
अर्थ —
जाम्बवान के सुन्दर वचन सुनकर हनुमान जी के हृदय को बहुत प्रिय लगे । उन्होंने कहा — हे भाई! तुम लोग दुःख सहकर कन्द-मूल-फल खाते हुए तब तक मेरी प्रतीक्षा करना।
जब लगि आवौं सीतहि देखी ।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा ।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥ २ ॥
अर्थ —
जब तक मैं सीताजी को देखकर लौट न आऊँ, तब तक कार्य अवश्य सिद्ध होगा । यह कहकर सबको प्रणाम कर, हृदय में श्रीराम को धारण कर हनुमान जी हर्षपूर्वक चल पड़े।
सिंधु तीर एक भूधर सुन्दर ।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ।
बार बार रघुबीर सँभारी ।
तरकेउ पवनतनय बल भारी ॥ ३ ॥
अर्थ —
समुद्र के तीर पर एक सुन्दर पर्वत था।
हनुमान जी खेल-ही-खेल में कूदकर उसके ऊपर चढ़ गए।
बार-बार श्रीरघुवीर का स्मरण करके
अत्यन्त बलवान पवनपुत्र वहाँ से बड़े वेग से उछले।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमन्ता ।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता ।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना ।
एही बाँति चलेउ हनुमाना ॥ ४ ॥
अर्थ —
जिस पर्वत पर हनुमान जी ने चरण रखा,
वह तुरन्त पाताल में धँस गया।
जैसे श्रीरघुनाथ जी का अमोघ बाण चलता है,
उसी प्रकार हनुमान जी आगे बढ़ते चले गए।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी ।
तै मैनाक होहि श्रमहारी ॥ ५ ॥
अर्थ —
समुद्र ने हनुमान जी को श्रीरघुनाथ का दूत समझकर
मैनाक पर्वत से कहा —
हे मैनाक! तू इनकी थकावट हरने वाला बन,
अर्थात् इन्हें अपने ऊपर विश्राम दे।
॥ दोहा ॥
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम ॥
अर्थ —
हनुमान जी ने पर्वत को छूकर प्रणाम किया और कहा — श्रीराम का कार्य किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?
जात पवनसुत देवन्ह देखा ।
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता ।
पठइन्हि आइ कही रेहिं बाता ॥ १ ॥
अर्थ —
देवताओं ने पवनपुत्र हनुमान जी को जाते हुए देखा।
उनकी विशेष बल और बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए
उन्होंने सर्पों की माता सुरसा को भेजा।
सुरसा आकर हनुमान जी से यह बात कहने लगी।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा ।
सुनत बचन कह पवनकुमारा ।
राम काजु करि फिरि मैं आवाँ ।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ॥ २ ॥
अर्थ —
आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है।
यह सुनकर पवनकुमार हनुमान जी बोले—
मैं श्रीराम का कार्य पूरा करके लौटूँगा
और सीताजी की खोज का समाचार प्रभु को सुनाऊँगा।
तब तव बदन पैठिहउँ आई ।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ।
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना ।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥ ३ ॥
अर्थ —
तब हनुमान जी बोले—
मैं तुम्हारे मुख में प्रवेश कर जाऊँगा,
तुम मुझे खा लेना, पर अभी मुझे जाने दो।
जब सुरसा किसी भी उपाय से नहीं मानी,
तो हनुमान जी बोले—तो मुझे ग्रस लो।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा ।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ ॥ ४ ॥
अर्थ —
सुरसा ने एक योजन तक मुख फैलाया।
हनुमान जी ने अपने शरीर को उससे दूना कर लिया।
उसने सोलह योजन मुख किया,
तो पवनपुत्र तुरंत बत्तीस योजन के हो गए।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा ।
तासु दून कपि रूप देखावा ॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा ।
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥ ५ ॥
अर्थ —
जैसे-जैसे सुरसा अपना मुख बढ़ाती गई,
हनुमान जी उससे दूना रूप दिखाते रहे।
जब सुरसा ने सौ योजन का मुख किया,
तब पवनपुत्र ने अत्यन्त छोटा रूप धारण कर लिया।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा ।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा ।
बुधि बल मरमु तोर मैं पावा ॥ ६ ॥
अर्थ —
हनुमान जी उसके मुख में प्रवेश कर
तुरन्त फिर बाहर निकल आए और
उसे सिर नवाकर विदा माँगी।
सुरसा बोली— देवताओं ने जिस उद्देश्य से
मुझे भेजा था, मैं तुम्हारी बुद्धि और बल का
भेद जान चुकी हूँ।
॥ दोहा ॥
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान् ॥ २ ॥
अर्थ —
तुम श्रीरामचन्द्र जी का समस्त कार्य पूर्ण करोगे,
क्योंकि तुम बल और बुद्धि के भण्डार हो।
यह आशीर्वाद देकर वह चली गई,
और हनुमान जी हर्षित होकर आगे बढ़े।
॥ चौपाई ॥
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई ।
करि माया नभु के खग गहई ॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं ।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ॥ १ ॥
अर्थ —
समुद्र में एक राक्षसी रहती थी।
वह माया द्वारा आकाश में उड़ने वाले
पक्षियों को पकड़ लेती थी।
जो जीव आकाश में उड़ते थे,
वह जल में उनकी परछाईं देखकर
उन्हें पकड़ लेती थी।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई ।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा ।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥ २ ॥
अर्थ —
वह परछाईं पकड़ लेती थी,
जिससे वे उड़ नहीं पाते थे और
जल में गिर पड़ते थे।
इस प्रकार वह सदा आकाश में
उड़ने वाले जीवों को खा जाती थी।
उसने वही छल हनुमान जी के साथ किया,
पर कपि ने तुरन्त उसका कपट पहचान लिया।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा ।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा ॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा ।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा ॥ ३ ॥
अर्थ —
पवनपुत्र वीर और धीर बुद्धि वाले
हनुमान जी उसे मारकर समुद्र के पार गए।
वहाँ जाकर उन्होंने वन की शोभा देखी।
फूलों के मधु के लोभ से भौंरे
गूँजते हुए मंडरा रहे थे।
नाना तरु फल फूल सुहाए ।
खग मृग बृंद देखि मन भाए ॥
सैल बिसाल देखि एक आगें ।
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें ॥ ४ ॥
अर्थ —
अनेक प्रकार के वृक्ष फल-फूलों से शोभित थे।
पक्षियों और पशुओं के समूह देखकर
हनुमान जी का मन प्रसन्न हुआ।
सामने एक विशाल पर्वत देखकर
वे भय त्यागकर दौड़कर उस पर चढ़ गए।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई ।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी ।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥ ५ ॥
अर्थ —
शिवजी कहते हैं— हे उमा!
इसमें कपि हनुमान की कोई बड़ाई नहीं है।
यह प्रभु श्रीराम का प्रताप है,
जो काल को भी खा जाता है।
पर्वत पर चढ़कर उन्होंने लंका को देखा—
वह अत्यन्त दुर्गम और विशेष किला है,
जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा ।
कनक कोट कर परम प्रकासा ॥ ६ ॥
अर्थ —
लंका अत्यन्त ऊँची थी,
चारों ओर समुद्र से घिरी हुई।
उसके स्वर्णमय परकोटे और प्राचीर
अत्यन्त तेजस्वी प्रकाश से जगमगा रहे थे।
॥ छन्द ॥
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना ।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै ।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥ १ ॥
अर्थ —
विचित्र मणियों से जड़ा हुआ सोने का परकोटा है,
जिसके भीतर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर भवन हैं।
चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग और गलियाँ हैं—
नगर अनेक प्रकार से सुसज्जित है।
हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल और रथों के समूहों को
कौन गिन सकता है?
अनेक रूपों वाले राक्षसों के दल हैं,
जिनकी अत्यन्त बलशाली सेना का वर्णन करना कठिन है।
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं ।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ॥
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं ।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं ॥ २ ॥
अर्थ —
वन, बाग, उपवन, फुलवारियाँ, तालाब, कुएँ और बावलियाँ
अत्यन्त सुशोभित हैं।
मनुष्य, नाग, देवता और गन्धर्वों की कन्याएँ
अपने सौन्दर्य से मुनियों के मन को भी मोहित कर लेती हैं।
कहीं पर्वत के समान विशाल शरीर वाले
अत्यन्त बलवान पहलवान गरज रहे हैं।
वे अनेक अखाड़ों में भिन्न-भिन्न प्रकार से
एक-दूसरे को ललकारते हुए भिड़ते हैं।
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं ।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही ।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥ ३ ॥
अर्थ —
भयंकर शरीर वाले करोड़ों योद्धा
बड़ी सावधानी से नगर की चारों दिशाओं में रक्षा कर रहे हैं।
कहीं दुष्ट राक्षस भैंस, मनुष्य, गाय,
गधे और बकरों को खा रहे हैं।
तुलसीदास जी ने इनकी कथा थोड़ी ही कही है,
क्योंकि ये सब श्रीरामचन्द्र जी के बाणरूपी तीर्थ में
शरीर त्यागकर निश्चय ही परम गति को प्राप्त होंगे।
॥ दोहा ३ ॥
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार ।
अति लघु रूप धरौँ निसि नगर करौं पइसार ॥ ३ ॥
अर्थ —
नगर के असंख्य रखवालों को देखकर हनुमान जी ने मन में विचार किया कि
मैं अत्यन्त छोटा रूप धारण करूँ और रात्रि में नगर में प्रवेश करूँ।
मसक समान रूप कपि धरी ।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी ।
सो कह चलेसि मोहि निंदरी ॥ १ ॥
अर्थ —
हनुमान जी ने मच्छर के समान छोटा रूप धारण किया
और नररूप में लीला करने वाले श्रीराम का स्मरण कर लंका की ओर चले।
लंका के द्वार पर लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी।
उसने कहा— मुझे तुच्छ समझकर (बिना पूछे) कहाँ जा रहा है?
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा ।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥
मुठिका एक महा कपि हनी ।
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥ २ ॥
अर्थ —
राक्षसी बोली— हे मूर्ख! तू मेरा भेद नहीं जानता।
यहाँ जितने भी चोर आते हैं, वे सब मेरा आहार हैं।
तब महाकपि हनुमान जी ने उसे एक घूँसा मारा,
जिससे वह रक्त उगलती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी।
पुनि संभारि उठी सो लंका ।
जोरि पानि कर बिनय ससंका ॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा ।
चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ॥ ३ ॥
अर्थ —
वह लंकिनी फिर अपने को सँभालकर उठी
और भय से हाथ जोड़कर विनती करने लगी।
वह बोली— जब ब्रह्माजी ने रावण को वर दिया था,
तब जाते समय उन्होंने मुझे यह पहचान बताई थी।
बिकल होसि तैं कपि के मारे ।
तब जानेसु निसिचर संघारे ॥
तात मोर अति पुन्य बहूता ।
देखेउँ नयन राम कर दूता ॥ ४ ॥
अर्थ —
उन्होंने कहा था— जब तू किसी वानर के प्रहार से व्याकुल हो जाए,
तब समझ लेना कि राक्षसों का संहार निकट है।
हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं कि
मैंने अपनी आँखों से श्रीराम के दूत आपको देखा।
॥ दोहा ४ ॥
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग ।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥ ४ ॥
अर्थ —
हे तात! यदि स्वर्ग और मोक्ष के समस्त सुखों को
तराजू के एक पलड़े में रखा जाए,
तो भी वे सब मिलकर उस सुख के बराबर नहीं हो सकते,
जो क्षणमात्र के सत्संग से प्राप्त होता है।
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा ।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा ॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई ।
गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥ १ ॥
अर्थ —
कोसलपुरी के राजा श्रीरघुनाथ जी को
हृदय में धारण करके नगर में प्रवेश कर
सभी कार्य सम्पन्न कीजिये।
उनकी कृपा से विष अमृत बन जाता है,
शत्रु मित्र हो जाते हैं,
समुद्र गाय के खुर के समान हो जाता है
और अग्नि में भी शीतलता आ जाती है।
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही ।
राम कृपा करि चितवा जाही ॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना ।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥ २ ॥
अर्थ —
जिस पर श्रीरामचन्द्र जी ने कृपा दृष्टि डाल दी,
उसके लिए सुमेरु पर्वत भी रज के समान हो जाता है।
तब हनुमान जी ने अत्यन्त छोटा रूप धारण किया
और भगवान् का स्मरण करते हुए
नगर में प्रवेश किया।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा ।
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं ।
अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं ॥ ३ ॥
अर्थ —
हनुमान जी ने एक-एक महल की खोज की।
जहाँ-तहाँ असंख्य योद्धा दिखाई दिए।
इसके बाद वे रावण के महल में पहुँचे,
जो अत्यन्त विचित्र था
और जिसका वर्णन किया नहीं जा सकता।
सयन किएँ देखा कपि तेही ।
मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा ।
हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा ॥ ४ ॥
अर्थ —
हनुमान जी ने रावण को शयन करते हुए देखा,
किन्तु उस महल में जानकी जी दिखाई नहीं दीं।
फिर उन्होंने एक और सुन्दर भवन देखा,
जहाँ भगवान् श्रीहरि का
अलग से मंदिर बना हुआ था।
॥ दोहा ॥
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ ॥ ५ ॥
अर्थ —
वह महल श्रीरामजी के आयुध (धनुष-बाण) के चिन्हों से अंकित था,
जिसकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता।
वहाँ नवीन तुलसी के वृक्ष-समूहों को देखकर
कपिराज हनुमान जी अत्यन्त हर्षित हुए।
लंका निसिचर निकर निवासा ।
इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥
मन महुँ तरक करें कपि लागा ।
तेहीं समय बिभीषनु जागा ॥ १ ॥
अर्थ —
लंका राक्षसों के समूह का निवास स्थान है।
यहाँ सज्जनों का निवास कहाँ हो सकता है?
हनुमान जी मन में ऐसा तर्क करने लगे।
उसी समय विभीषण जी जाग उठे।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा ।
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी ।
साधु ते होइ न कारज हानी ॥ २ ॥
अर्थ —
विभीषण जी ने ‘राम-राम’ का स्मरण किया।
हनुमान जी ने उन्हें सज्जन पहचान लिया
और हृदय में अत्यन्त प्रसन्न हुए।
उन्होंने मन में विचार किया कि
इनसे स्वयं ही परिचय कर लूँ,
क्योंकि साधु से कार्य की हानि नहीं होती।
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए ।
सुनत बिभीषन उठि तहँ आए ॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई ।
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ॥ ३ ॥
अर्थ —
हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप धारण कर
विभीषण जी को पुकारा।
सुनते ही विभीषण जी उठकर वहाँ आए।
उन्होंने प्रणाम कर कुशल पूछी और कहा—
हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा विस्तार से कहिए।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई ।
मोरें हृदय प्रीति अति होई ॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी ।
आयहु मोहि करन बड़भागी ॥ ४ ॥
अर्थ —
क्या आप भगवान के भक्तों में से कोई हैं?
क्योंकि आपको देखकर मेरे हृदय में
अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है।
अथवा क्या आप स्वयं दीनों पर कृपा करने वाले
श्रीराम हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने आए हैं?
॥ दोहा ६ ॥
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम ।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥ ६ ॥
अर्थ —
तब हनुमान जी ने श्रीरामचन्द्र जी की सम्पूर्ण कथा कहकर
अपना नाम बताया।
सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गए
और श्रीराम के गुणसमूहों का स्मरण कर
दोनों के मन प्रेम और आनन्द में मग्न हो गए।
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी ।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा ।
करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ॥ १ ॥
अर्थ —
विभीषण जी बोले— हे पवनपुत्र! मेरी स्थिति सुनो।
मैं यहाँ उसी प्रकार रहता हूँ,
जैसे दाँतों के बीच बेचारी जीभ रहती है।
हे तात! मुझे अनाथ जानकर
क्या सूर्यकुल के नाथ श्रीराम
कभी मुझ पर कृपा करेंगे?
तामस तनु कछु साधन नाहीं ।
प्रीति न पद सरोज मन माहीं ॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता ।
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता ॥ २ ॥
अर्थ —
मेरा तामसी (राक्षसी) शरीर होने से
कोई साधन बन नहीं पड़ता
और न ही मन में श्रीराम के चरणकमलों में प्रेम है।
किन्तु हे हनुमान! अब मुझे विश्वास हो गया है कि
श्रीराम की मुझ पर कृपा है,
क्योंकि हरि की कृपा के बिना
संतों का मिलना सम्भव नहीं।
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा ।
तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती ।
करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥ ३ ॥
अर्थ —
जब श्रीरघुवीर ने कृपा की है,
तभी तो आपने हठ करके मुझे दर्शन दिए हैं।
हनुमान जी बोले—
हे विभीषण! सुनिए,
प्रभु की यही रीति है कि
वे अपने सेवकों पर सदा प्रेम करते हैं।
कहहु कवन मैं परम कुलीना ।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा ।
तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ॥ ४ ॥
अर्थ —
भला कहिए, मैं कौन सा बड़ा कुलीन हूँ?
मैं तो चंचल स्वभाव वाला वानर हूँ
और सब प्रकार से हीन हूँ।
सुबह जो हमारे (वानरों) का नाम ले ले,
उसे उस दिन भोजन तक नहीं मिलता।
॥ दोहा ७ ॥
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर ।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ॥ ७ ॥
अर्थ —
हे सखा! सुनिए, मैं तो अत्यन्त अधम हूँ,
पर श्रीरघुवीर ने मुझ पर भी कृपा की है।
भगवान् के गुणों का स्मरण करते ही
हनुमान जी की आँखों में प्रेमाश्रुओं का जल भर आया।
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी ।
फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा ।
पावा अनिर्वाच्य बिश्रामा ॥ १ ॥
अर्थ —
जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी श्रीराम को भुलाकर
विषयों के पीछे भटकते रहते हैं,
वे दुःखी क्यों न हों?
इस प्रकार श्रीराम के गुणसमूहों का
कथन करते हुए उन्होंने
अनिर्वचनीय (परम) शान्ति प्राप्त की।
पुनि सब कथा बिभीषन कही ।
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता ।
देखी चहउँ जानकी माता ॥ २ ॥
अर्थ —
फिर विभीषण जी ने वह सारी कथा कही,
कि जनकनन्दिनी सीता जी वहाँ
किस प्रकार रहती थीं।
तब हनुमान जी बोले—
हे भाई! सुनो, मैं
जानकी माता को देखना चाहता हूँ।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई ।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई ॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ ।
बन असोक सीता रह जहवाँ ॥ ३ ॥
अर्थ —
विभीषण जी ने माता के दर्शन की
सारी युक्तियाँ बता दीं।
तब हनुमान जी उनसे विदा लेकर चले।
फिर वही (अत्यन्त लघु) रूप धारण कर
वहाँ पहुँचे, जहाँ अशोकवन में
सीता जी निवास कर रही थीं।
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा ।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी ।
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥ ४ ॥
अर्थ —
सीता जी को देखकर हनुमान जी ने
मन ही मन उन्हें प्रणाम किया।
वे बैठे-बैठे ही रात के चारों पहर बिता देती हैं।
उनका शरीर अत्यन्त कृश हो गया है,
सिर पर जटाओं की एक वेणी है
और वे हृदय में श्रीरघुपति के
गुणसमूहों का निरन्तर जप करती रहती हैं।
॥ दोहा ८ ॥
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन ।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥ ८ ॥
अर्थ —
श्रीजानकी जी नेत्रों को अपने चरणों में लगाए हुए
(नीचे की ओर देख रही हैं) और उनका मन
श्रीराम के चरणकमलों में लीन है।
जानकी जी को इस प्रकार दीन-दुःखी देखकर
पवनपुत्र हनुमान जी अत्यन्त दुःखी हो गए।
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई ।
करइ बिचार करौं का भाई ॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा ।
संग नारि बहु किएँ बनावा ॥ १ ॥
अर्थ —
हनुमान जी वृक्ष के पत्तों में छिपे रहे
और मन में विचार करने लगे कि
अब क्या किया जाए?
उसी समय बहुत-सी स्त्रियों के साथ
सज-धजकर रावण वहाँ आ पहुँचा।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा ।
साम दान भय भेद देखावा ॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी ।
मंदोदरी आदि सब रानी ॥ २ ॥
अर्थ —
उस दुष्ट रावण ने सीता जी को
अनेक प्रकार से समझाने का प्रयत्न किया।
उसने साम, दान, भय और भेद—सब उपाय दिखाए।
रावण बोला— हे सुमुखि! हे सयानी!
मन्दोदरी आदि मेरी सभी रानियाँ—
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा ।
एक बार बिलोकु मम ओरा ॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही ।
सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥ ३ ॥
अर्थ —
मैं तुम्हें अपनी दासी बना लूँगा—यह मेरा प्रण है।
एक बार मेरी ओर देख तो लो!
अपने परम स्नेही अवधपति श्रीराम का
स्मरण करके जानकी जी
तिनके की आड़ लेकर बोलीं—
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा ।
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ॥
अस मन समुझु कहति जानकी ।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥ ४ ॥
अर्थ —
हे दशमुख! सुन—
क्या कभी जुगनू के प्रकाश से कमल खिल सकता है?
जानकी जी बोलीं—
तू भी अपने मन में यही समझ ले।
हे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीर के बाणों की
शक्ति का ज्ञान नहीं है।
सठ सूनें हरि आनेहि मोही ।
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ॥ ५ ॥
अर्थ —
रे मूर्ख! तू मुझे एकान्त में हर लाया है।
हे अधम! हे निर्लज्ज!
तुझे तनिक भी लज्जा नहीं आती?
॥ दोहा ९ ॥
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान ।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन ॥ ९ ॥
अर्थ —
अपने को जुगनू के समान और श्रीराम को सूर्य के समान
कहा गया सुनकर तथा सीता जी के कठोर वचनों को सुनकर
रावण अत्यन्त क्रोधित हो गया।
उसने तलवार निकालकर गुस्से में बोलना आरम्भ किया।
सीता तैं मम कृत अपमाना ।
कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना ॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी ।
सुमुखि होति न त जीवन हानी ॥ १ ॥
अर्थ —
रावण बोला— हे सीता! तूने मेरा अपमान किया है।
मैं इस कठोर तलवार से तेरा सिर काट डालूँगा।
यदि अभी भी मेरी बात नहीं मानी,
तो हे सुमुखि! तुझे प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर ।
प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर ॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा ।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥ २ ॥
अर्थ —
सीता जी बोलीं— हे दशमुख!
प्रभु श्रीराम की भुजाएँ
श्याम कमल-माला के समान सुन्दर
और हाथी की सूँड़ के समान बलवान हैं।
या तो वही भुजा मेरे कण्ठ में पड़ेगी
या तेरी यह भयानक तलवार।
हे दुष्ट! सुन, यही मेरा अटल प्रण है।
चंद्रहास हरु मम परितापं ।
रघुपति बिरह अनल संजातं ॥
सीतल निसित बहसि बर धारा ।
कह सीता हरु मम दुख भारा ॥ ३ ॥
अर्थ —
सीता जी कहती हैं—
हे चन्द्रहास तलवार!
श्रीरघुनाथ के विरह से उत्पन्न
मेरे इस महान् दाह को तू हर ले।
तेरी धारा शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ है,
तू मेरे दुःख के भार को दूर कर दे।
सुनत बचन पुनि मारन धावा ।
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई ।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥ ४ ॥
अर्थ —
सीता जी के ये वचन सुनते ही
रावण फिर उन्हें मारने दौड़ा।
तभी मयदानव की पुत्री मन्दोदरी ने
नीति की बात कहकर उसे समझाया।
तब रावण ने सब राक्षसियों को बुलाकर कहा—
जाकर सीता को अनेक प्रकार से भय दिखाओ।
मास दिवस महुँ कहा न माना ।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना ॥ ५ ॥
अर्थ —
यदि एक महीने के भीतर भी यह मेरी बात न माने,
तो मैं तलवार निकालकर इसे मार डालूँगा।
॥ दोहा १० ॥
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद ।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद ॥ १० ॥
अर्थ —
इस प्रकार कहकर रावण अपने भवन को चला गया।
यहाँ अनेक राक्षसियों के समूह
भयानक और विकराल रूप धारण करके
सीता जी को डराने लगे।
त्रिजटा नाम राच्छसी एका ।
राम चरन रति निपुन बिबेका ॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना ।
सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥ १ ॥
अर्थ —
उन राक्षसियों में त्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी।
उसका श्रीरामचन्द्र जी के चरणों में प्रेम था
और वह विवेक तथा ज्ञान में निपुण थी।
उसने सबको बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया
और कहा— सीता जी की सेवा करो,
इसी में तुम्हारा कल्याण है।
सपनें बानर लंका जारी ।
जातुधान सेना सब मारी ॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा ।
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥ २ ॥
अर्थ —
मैंने स्वप्न में देखा कि एक वानर ने लंका जला दी
और राक्षसों की पूरी सेना मारी गई।
रावण नग्न अवस्था में गधे पर सवार है,
उसके सिर मुड़े हुए हैं
और उसकी बीसों भुजाएँ कट चुकी हैं।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई ।
लंका मनहुँ बिभीषन पाई ॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई ।
तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥ ३ ॥
अर्थ —
इस प्रकार वह दक्षिण दिशा (यमपुरी की ओर)
जाता हुआ दिखाई देता है
और ऐसा प्रतीत होता है मानो
लंका विभीषण को प्राप्त हो गई हो।
नगर में श्रीरामचन्द्र जी की दुहाई फिर जाती है
और तब प्रभु सीता जी को बुला भेजते हैं।
यह सपना मैं कहउँ पुकारी ।
होइहि सत्य गएँ दिन चारी ॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं ।
जनकसुता के चरनन्हि परीं ॥ ४ ॥
अर्थ —
त्रिजटा पुकारकर कहती है—
यह स्वप्न चार ही दिनों में सत्य हो जाएगा।
उसके वचन सुनकर सब राक्षसियाँ डर गईं
और जानकी जी के चरणों में गिर पड़ीं।


shastrianand701@gmail.com