प्रदोष व्रत कथा हिंदी

AnandShastri
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प्रदोष व्रत कथा हिंदी

🔱 पक्ष प्रदोष व्रत माहात्म्य 🔱


ऋषि बोले - हे सूत जी ! अशेष पापों का हरण करने वाले , अत्यन्त उत्तम एवं महान् आख्यानों से युक्त भगवान शिव के माहात्म्य का आपने कथन किया है ॥ १ ॥ हम पुनः सावधान होकर शिवजी के माहात्म्य-श्रवण की इच्छा करते हैं, शिव के उपासक महात्माओं के द्वारा प्रदोष काल में पूजित शम्भु  ॥ २ ॥ किस प्रकार की सिद्धि प्रदान करते हैं ? हे सुव्रत ! वह सब आप हमसे कहिये। अनेकों बार हमने शिव के माहात्म्य का श्रवण किया है, फिर भी हमारी सुनने की इच्छा बलवती हो रही है ॥ ३ ॥ सूत जी ने कहा - महाबुद्धिमानों! आप जैसे लोक-प्रसिद्ध ऋषियों ने बहुत ही श्रेष्ठ बात पूँछी है, इसलिए मैं शिव-पूजा के महान् फल को अच्छी तरह बताता हूँ ॥ ४ ॥ त्रयोदशी तिथि में सायं प्रदोष काल कहा गया है,उस समय अभीष्ट फल की इच्छा वालों को भगवान् महादेव का पूजन करना चाहिए, इस वेला में अन्य देवताओं का पूजन न करे ॥ ५ ॥ प्रदोष-पूजा के महत्व का कोई भी वर्णन करने में समर्थ नहीं है,इस काल में समस्त देव-गण भगवान् शिव के समीप उपस्थित हो जाते हैं ॥ ६ ॥ प्रदोष के समय महादेव कैलाश पर्वत पर स्थित रजत-भवन में नृत्य करते हैं, और सभी देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं ॥ ७ ॥ अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की इच्छा रखने वाले पुरुषों को प्रदोष काल में नियम पूर्वक शिव की पूजा, होम, कथा और गुणगान करने चाहिए ॥ ८ ॥ दरिद्रता के अन्धकार से अन्धे व भवसागर में डूबे हुए संसारभय से भीरू मनुष्यों के लिए यह प्रदोष व्रत पार लगाने वाली नौका है ॥ ९ ॥ दुःख, शोक, भय से पीड़ितों और समस्त क्लेशों से मुक्ति पाने की इच्छा रखने वालों को प्रदोष में पार्वती पति का पूजन सर्वविध मङ्गल प्रदान करता है ॥ १० ॥ दुर्बुद्धि, नीच, मन्दभाग्य व मूर्ख व्यक्ति भी प्रदोष में देवेश का पूजन करके विपत्तियों से मुक्त हो जाता है ॥ ११ ॥ शत्रुओं से मारा जाता हुआ भी, जहरीले नागों से काटा जाता हुआ भी, पर्वतों से गिराया जाता हुआ भी, महासमुद्र में गिरा हुआ भी ॥ १२ ॥ काल दण्ड से आबद्ध होता हुआ भी एवं अनेक रोगों से ग्रसित होने पर भी प्रदोष में शिव पूजन से मनुष्य नष्ट नहीं होता ।। १३ ।। अनेक रोगों से ग्रसित होने पर भी प्रदोष में शिव पूजन से मनुष्य नष्ट नहीं होता॥ १३ ॥ भगवान् शिव की पूजा करने से मनुष्य दरिद्रता, मृत्यु-दुःख और पर्वत के समान भारी ऋण-भार को शीघ्र ही दूर करके सम्पत्तियों से पूजित होता है ॥ १४॥ इस सम्बन्ध में मैं महापुण्य प्रद एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ, जिसको सुनकर मनुष्य कृतकृत्यता को प्राप्त हो जाते हैं ॥ १५ ॥ विदर्भ देश में सत्य रथ नाम के एक प्रसिद्ध राजा थे, जो सब धर्मों में तत्पर, धीर, सुशील और सत्य प्रतिज्ञ थे ॥ १६ ॥ हे श्रेष्ठ मूनियों ! धर्म पूर्वक पृथिवी का पालन करते हुए उनका बहुत सा समय सुख पूर्वक बीत गया ॥ १७ ॥ कुछ काल बाद शाल्वदेश के राजा सत्य रथ के शत्रु बन गये, जोंकि उन्मत्त बलशाली व दुर्धर्ष योद्धा थे ॥ १८ ॥ एक दिन विजय की इच्छा से बहुत से सैनिकों से युक्त शाल्व राजाओं ने विदर्भ नगर पर आक्रमण करके उसे चारों ओर से घेर लिया॥ १९ ॥ अपनी पुरी को शत्रुओं से घिरी देख विदर्भ राज विशाल सेना के साथ युद्ध के लिए आये ॥ २० ॥ बलोन्मत्त शाल्वदेशीय क्षत्रियों के साथ राजा का भयङ्कर युद्ध हुआ, जैसे कि पाताल में कभी दुर्मद गन्धर्वों के साथ पन्नगेन्द्र का युद्ध हुआ था ॥ २१ ॥ उस युद्ध में शाल्वों की बहुत बड़ी सेना मारी गयी, परन्तु अन्त में विदर्भ राज भी दारुण युद्ध करते हुए रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हो गए ॥ २२ ॥ मन्त्रियों के सहित उस महारथी वीर राजा के मारे जाने पर मरने से बचे हुए सैनिक भाग खड़े हुए ॥ २३॥ मन्त्री सहित राजा के मारे जाने व युद्ध विराम हो जाने पर शत्रु वर्ग नगर में प्रवेश कर गया और युद्ध से पीड़ित नगर में हाहाकार मच गया ॥ २४ ॥ उस समय विदर्भराज सत्यरथ की एक पतिव्रता स्त्री अत्यन्त शोक से ग्रस्त होती हुई सावधानी से राजमहल से बाहर निकल गयी ॥ २५ ॥ वह शोक संतप्त नृपाङ्गना यत्नपूर्वक रात के समय राज भवन से निकल कर पश्चिम दिशा की ओर चली गयी। वह गर्भवती थी ॥ २६ ॥ प्रातः काल होने पर धीरे- धीरे मार्ग से जाती हुई उस साध्वी रानी ने बहुत दूर का रास्ता पार करने के पश्चात् एक स्वच्छ तालाब देखा ॥ २७ ॥ भारी ताप से तप्त वह रानी वहाँ आकर तालाब के किनारे स्थित एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठ गयी ॥ २८ ॥ भाग्यवश उसी निर्जन स्थान पर वृक्ष केनीचे ही पतिव्रता रानी ने उत्तम गुणों से युक्त शुभ मुहूर्त में एक पुत्र को जन्म दिया ॥ २९ ॥ पत्पश्चात् अत्यन्त प्यास से व्याकुल हो वह सुन्दर अङ्गों वाली रानी जलाशय में उतरी, इतने में ही एक बड़े भारी ग्राह ने आकर उसे अपना ग्रास बना लिया ॥ ३० ॥ वह बालक पैदा होते ही माता-पिता से विहीन हो गया और भूख-प्यास से पीड़ित हो उस सरोवर के किनारे जोर-जोर से रोने लगा ॥ ३१ ॥ वह नवजात शिशु जब इस प्रकार क्रन्दन कर रहा था, उसी समय भाग्यवश वहाँ एक श्रेष्ठ ब्राह्मणी आ पहुँची ॥ ३२ ॥ वह भी अपने एक वर्ष के बालक को गोद में लिए हुए थी । वह ब्राह्मणी निर्धन और विधवा थी और घर-घर भीख मांग कर जीवन- निर्वाह करती थी ॥ ३३ ॥ शिक्षा मांगती हुई मार्ग में चलने वाली, बन्धु विहीन एक पुत्र वाली उस साध्वी ब्राह्मणी का नाम उमा था। उसने रोते हुए उस राजकुमार को देखा ॥ ३४ ॥ वह ब्राह्मणी सूर्य के बिम्ब के समान पृथ्वी पर पड़े इस प्रकार क्रन्दन करते हुए अनाथ राज पुत्र को देखकर बहुत चिन्ता करने लगी ॥ ३५ ॥ अहो ! यह तो बहुत आश्चर्य की बात दिखायी देती है कि जिसका नाल भी अभी कटा नहीं है, यहां पड़ा हुआ है। इसकी माता कहां चली गयी? ॥ ३६ ॥ न इसका पिता है, न कोई और बन्धुबान्धव है। यह दीन अनाथ बालक केवल भूमि पर रो रहा है ॥ ३७ ॥ यह चाण्डाल का पुत्र है या शूद्र का, वैश्य का बालक है या ब्राह्मण का अथवा यह क्षत्रिया का शिशु है, इसका निश्चय कैसे किया जाय ? ॥ ३८ ॥ मैं इस शिशु को उठाकर अपने सगे पुत्र की तरह अवश्य पालन कर सकती हूँ; परन्तु यह किस कुल का है, यह न जानने के कारण इसे छूने का साहस नहीं होता ॥ ३९ ॥ वह पतिव्रता ब्राह्मणी इस प्रकार का विचार कर रही थी कि उसी समय कोई सन्यासी महात्मा वहां आ पहुँचे, वे ऐसे जान पड़ते थे कि मानों साक्षात् शङ्कर हों ॥ ४० ॥ उस श्रेष्ठ भिक्षु ने उस स्त्री से कहा- ब्राह्मणी ! खेद न करो, हृदय की संशय वृत्ति को दूर कर इस बालक की रक्षा करो ॥ ४१ ॥ इससे तुम्हें शीघ्र ही परम कल्याण की प्राप्ति होगी।' इतना कहकर वे दयालु भिक्षु तुरन्त वहां से चले गये॥ ४२॥ उस भिक्षुक के जाने के बाद ब्राह्मणी ने विश्वास पूर्वक उस बालक को साथ लेकर अपने घर की ओर प्रस्थान किया ॥ ४३ ॥ भिक्षुक के वाक्य से विश्वस्त सती ब्राह्मणी ने उस राजकुमार का अपने पुत्र के सामन ही पालन-पोषण किया ॥ ४४ ॥ एकचक्रा नामक नगर में उस ब्राह्मणी का घर था। वह भिक्षा के अन्न से ही अपने पुत्र और राजपुत्र को भी पालने लगी ॥ ४५ ॥ ब्राह्मणों ने ब्राह्मणी के तथा राजा के भी पुत्र का संस्कार कर दिया। वे दोनों सम्मानित होकर दिन-दिन बढ़ने लगे ॥ ४६ ॥ समय आने पर उनका उपनयन संस्कार हुआ, अब वे दोनों बालक एक साथ रहकर नियमों का पालन करने लगे और दोनों माता के साथ प्रतिदिन भिक्षा के लिए जाते थे॥ ४७ ॥ एक दिन वह ब्राह्मणी उन दोनों बालकों के साथ भिक्षा मांगती हुयी दैव योग से देव मन्दिर में पहुँच गयी ॥ ४८ ॥ जहाँ वयोवृद्ध व विद्या वृद्ध ऋषि-मुनि उपस्थित थे । उन दोनों बालकों को देखकर परम बुद्धिमान् शाण्डिल्य मुनि ने कहा ॥ ४९ ॥ अहो ! देव का बल बड़ा विचित्र है । कर्मों का उल्लङ्घन करना किसी भी जीव के लिए अत्यन्त कठिन है। देखो, यह बालक दूसरी माता की शरण लेकर भिक्षा से जीवन-निर्वाह करता है ॥ ५० ॥ इस ब्राह्मणी को ही श्रेष्ठ माता के रूप में प्राप्त कर ब्राह्मण बालक के साथ ब्राह्मण-भाव को प्राप्त हो गया है ॥ ५१ ॥ शाण्डिल्य मुनि का यह वचन सुनकर ब्राह्मणी को बड़ा विस्मय हुआ। उसने भरी सभा में मुनि को प्रणाम करके पूँछा॥५२॥ ब्रह्मन्! एक सन्यासी के कहने से मैं इस बालक को अपने घर ले आयी हूँ। यद्यपि अभी तक इसके कुल का पता नहीं लगा, तथापि मैं पुत्र की तरह इसका पालन-पोषण करती हूँ ॥ ५३ ॥ आप ज्ञान - नेत्रों से देखते हैं, अतः आपसे मैं यह जानना चाहती हूँ कि बालक किस कुल में उत्पन्न हुआ है और इसके माता-पिता कौन हैं ? ॥ ५४ ॥ द्विजस्त्री के द्वारा इस प्रकार पूँछने पर शाण्डिल्य मुनि ने उस बालक के पूर्व जन्म और कर्म को ज्ञान दृष्टि से देखकर कहा॥ ५५ ॥ यह विदर्भ देश के राजा का पुत्र है। इसके पिता के युद्ध में मारे जाने तथा उसकी माता के ग्राह द्वारा ग्रस्त होने का समाचार पूर्ण रूप से बतलाया॥ ५६॥ यह सुनकर विस्मित होती हुई ब्राह्मणी ने मुनि से पूँछा कि वे राजा सम्पूर्ण भोगों को छोड़कर युद्ध में कैसे मारे गये? ॥ ५७ ॥ हे महात्मन्! इस बालक को दरिद्रता कैसे प्राप्त हुई ? अब दरिद्रता को नष्ट करके वह पुनः राज्य कैसे प्राप्त करेगा ? ॥ ५८ ॥ यह मेरा पुत्र भी भिक्षान्न से ही जीवन- निर्वाह करता है, अतः इसकी दरिद्रता के निवारण का क्या उपाय है ? यह बताने की कृपा करें ॥ ५९ ॥ शाण्डिल्य बोले- इस बालक के विदर्भराज पिता पूर्वजन्म में पाण्डव देश के श्रेष्ठ राजा थे ॥ ६० ॥ वे सब धर्मों के ज्ञाता थे और सम्पूर्ण पृथिवी का धर्म, पूर्वक पालन करते थे। एक दिन प्रदोष काल में राजा भगवान् शङ्कर का पूजन कर रहे थे ॥ ६१ ॥ बड़ी ही भक्ति-भाव से त्रिलोकीनाथ महादेव जी की आराधना में संलग्न थे। उसी समय नगर में सब ओर बड़ा भारी कोलाहल हुआ ॥ ६२ ॥ उस उत्कट शब्द को सुनकर राजा ने बीच में ही भगवान् शिव की पूजा छोड़ दी और नगर में क्षोभ फैलने की आशंका से राजभवन से बाहर निकल गये ॥६३ ॥ इसी समय राजा का महाबली मन्त्री शत्रु को पकड़कर उनके समीप ले आया ॥ ६४ ॥ अमात्य के द्वारा लाया गया उद्धत शत्रु पाण्ड्य राज्य का ही सामन्त था । उसे देखकर राजा ने क्रोधपूर्वक उसका मस्तक कटवा दिया ॥ ६५ ॥ शिव जी की पूजा को छोड़कर नियम को सम्पन्न किये बिना ही राजा ने रात्रि में भोजन भी कर लिया ॥ ६६ ॥ इसी प्रकार मूढात्मा व दुर्मदान्ध राज कुमार भी प्रदोष काल में शिव की पूजा किये बिना ही भोजन करके सो गया ॥ ६७ ॥ वही राजा दूसरे जन्म में विर्भदराज हुआ था, शिव की पूजा में विघ्न होने के कारण शत्रुओं ने उसे सुख-भोग के बीच में ही मार डाला ॥ ६८ ॥ पूर्वजन्म में जो उसका पुत्र था, वही इस जन्म में भी हुआ है। शिवजी की पूजा का उल्लङ्घन करने के कारण यह दरिद्रता को प्राप्त हुआ है ॥ ६९ ॥ इसकी माता ने पूर्व जन्म में छल से अपनी सौत को मार डाला था, उस पाप के कारण ही वह इस जन्म में ग्राह के द्वारा मारी गयी ॥ ७० ॥ इनकी इस प्रकार की प्रवृत्ति (पूर्व जन्म के कर्म) मैंने तुम्हारे सामने प्रकट की है। प्रदोष में भगवान् शिव की पूजा न करके मनुष्य दरिद्रता को प्राप्त करते हैं ॥ ७१ ॥ मैं सत्य कहता हूँ, परलोक में हित की बात कहता हूँ, शास्त्रों का सार एवं उपनिषदों का हृदय (रहस्य) कहता हूँ, इस भयङ्कर असार संसार को प्राप्त हुए जीव के लिए ईश्वर के चरणारविन्दों की सेवा ही सार वस्तु है ॥ ७२ ॥ जो प्रदोष काल में अनन्य चित्त होकर परमेश्वर के चरणाविन्दों की पूजा करते हैं, वे इसी संसार में सदा बढ़ने वाले धन-धान्य, स्त्री-पुत्र, सौभाग्य और सम्पत्ति के द्वारा सबसे बढ़कर होते हैं ॥ ७३ ॥ प्रदोष काल में कैलाश पवर्त के रजतभवन में स्वर्ण मण्डित रत्न - सिंहासन पर त्रैलोक्य-भगवती गौरी को विराजमान करके भगवान् शूलपाणि श्री शिव के इच्छापूर्वक नृत्य करने के लिये उद्यत होने पर सभी देवगण उनकी सेवा में संलग्न रहते हैं॥ ७४ ॥ जो मनुष्य प्रदोष काल में भगवान् गिरिश का समर्चन नहीं करते और जो शिव का पूजन न करके अन्य देवताओं को प्रणाम-स्तुति करते हैं, तथा जो अपने कर्ण-पुटकों से भगवान् शङ्कर की कथा का पान नहीं करते, वे मूढ़ जन जन्म-जन्म में दरिद्र होते हैं ॥ ७५ ॥ उस समय वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती वीणा वादन करती हैं, इन्द्र बाँसुरी बजाते हैं  


ब्रह्मा जी ताल दे - देकर उल्लासित होते हुए सबको उत्साहित करते हैं , श्री विष्णु कुशलतापूर्वक



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