बृहदवकहडाचक्रम्
मङ्गलाचरणम्
सूर्यचन्द्रमुखान्नत्वा ग्रहान् गणपतिं तथा ।
ज्योतिःशास्त्र प्रवेशायाऽवकहडाचक्रमुच्यते ।।
ज्योतिःशास्त्र प्रवेशायाऽवकहडाचक्रमुच्यते ।।
अर्थ : सूर्य और चन्द्र प्रमुख नवग्रहों तथा गणेश को नमस्कार करके ज्योतिषशास्त्र में प्रवेश के लिए बृहदवकहडाचक्र की रचना करता हूँ।
वारनामानि
आदित्यश्चन्द्रमा भौमो बुधश्चाथ बृहस्पतिः ।
शुक्रः शनैश्चरश्चैते वासराः परिकीर्तिताः ।।१।।
शुक्रः शनैश्चरश्चैते वासराः परिकीर्तिताः ।।१।।
अर्थ : आदित्य (रवि), चन्द्र (सोम), मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि — ये सात वार माने गए हैं।
शुभाशुभवाराः
गुरूश्चन्द्रो बुधः शुक्रः शुभा वाराः शुभे स्मृताः ।
क्रूरास्तु क्रूरकृत्येषु ग्राह्या भौमार्कसूर्यजाः ।।२।।
क्रूरास्तु क्रूरकृत्येषु ग्राह्या भौमार्कसूर्यजाः ।।२।।
अर्थ : बुध, गुरु, शुक्र तथा शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा शुभ वार माने जाते हैं। इनमें शुभ कार्य सिद्ध होते हैं। रवि, मङ्गल और शनि क्रूर वार हैं, इनमें क्रूर कार्य सिद्ध होते हैं।
आवश्यके वारदोषपरिहारः
न वारदोषाः प्रभवन्ति रात्रौ देवेज्यदैत्येज्यदिवाकराणाम् ।
दिवा शशांकार्कजभूसुतानां सर्वत्र निन्द्यो बुधवारदोषः ।।३।।
दिवा शशांकार्कजभूसुतानां सर्वत्र निन्द्यो बुधवारदोषः ।।३।।
अर्थ : आवश्यक कार्य में सूर्य, गुरु और शुक्र के दिन का दोष रात्रि में नहीं होता। अर्थात् दिन में निषिद्ध कार्य रात्रि में किए जा सकते हैं। इसी प्रकार सोम, शनि और मङ्गल के रात्रि निषिद्ध कार्य दिन में किए जा सकते हैं। बुधवार का दोष दिन और रात्रि दोनों में समान रूप से निन्दनीय है।
तैलाभ्यङ्गे शुभाशुभवाराः
रविस्तापं कान्तिं वितरति शशी भूमितनयो
मूर्तिं लक्ष्मीं चान्द्रिः सुरपतिगुरूर्वित्तहरणम् ।
विपत्ति दैत्यानां गुरूरखिलभोगानुगमनं
नृणां तैलाभ्यङ्गात् सपदि कुरूते सूर्यतनयः ।।४।।
मूर्तिं लक्ष्मीं चान्द्रिः सुरपतिगुरूर्वित्तहरणम् ।
विपत्ति दैत्यानां गुरूरखिलभोगानुगमनं
नृणां तैलाभ्यङ्गात् सपदि कुरूते सूर्यतनयः ।।४।।
अर्थ : रवि के दिन तेल लगाने से ताप, सोम के दिन शोभा की वृद्धि, मङ्गल के दिन मृत्युभय, बुध के दिन लक्ष्मी प्राप्ति, गुरु के दिन धन की हानि, शुक्र के दिन विपत्ति और शनि के दिन तेल लगाने से सुख-शान्ति प्राप्त होती है।
आवश्यके तैलाभ्यङ्गे वारदोषपरिहारः
रवौ पुष्पं गुरौ दूर्वा मृत्तिका कुंजवासरे ।
भार्गवे गोमयं दद्यात् तैलदोषस्य शान्तये ।।५।।
भार्गवे गोमयं दद्यात् तैलदोषस्य शान्तये ।।५।।
अर्थ : आवश्यक कार्य में रवि के दिन पुष्प, गुरु के दिन दूर्वा, मङ्गल के दिन मिट्टी और शुक्र के दिन गोबर मिलाकर तेल लगाने से दोष नहीं होता।
मन्त्रितं क्वथितं तैलं सार्षपं पुष्पवासितम् ।
द्रव्यान्तरयुक्तं वापि नैव दुष्येत् कदाचन ।।६।।
द्रव्यान्तरयुक्तं वापि नैव दुष्येत् कदाचन ।।६।।
अर्थ : पकाया हुआ तेल, सरसों का तेल, पुष्पवासित तेल तथा किसी भी अन्य द्रव्य के संयोग से बना तेल निषिद्ध दिनों में भी लगाया जा सकता है।
श्रीपतिः मासज्ञानम्
मधुस्तथा माधवसंज्ञकश्च शुक्रः शुचिश्चाथ नभो नभस्यौ ।
तथेष उर्जश्च सहः सहस्यौ तपस्तपस्याविति ते क्रमेण ।।७।।
तथेष उर्जश्च सहः सहस्यौ तपस्तपस्याविति ते क्रमेण ।।७।।
अर्थ : मधु = चैत्र, माधव = वैशाख, शुक्र = ज्येष्ठ, शुचि = आषाढ़, नभ = श्रावण, नभस्य = भाद्रपद, ईष = आश्विन, ऊर्ज = कार्तिक, सहः = मार्गशीर्ष, सहस्य = पौष, तपः = माघ, तपस्य = फाल्गुन — ये वर्ष के बारह मास हैं।
ऋतूनाह श्रीपतिः
मृगादिसाशिद्वयभानुयोगात् षडर्त्तवः स्युः शिशिरो वसन्तः ।
ग्रीष्मश्च वर्षाश्च शरश्च तद्वद्धेमन्तनामा कथितश्च षष्ठः ।।८।।
ग्रीष्मश्च वर्षाश्च शरश्च तद्वद्धेमन्तनामा कथितश्च षष्ठः ।।८।।
अर्थ : मकर से प्रारम्भ होकर दो-दो राशियों में सूर्य के स्थित होने से छह ऋतुएँ होती हैं — मकर, कुम्भ (शिशिर), मीन, मेष (वसन्त), वृषभ, मिथुन (ग्रीष्म), कर्क, सिंह (वर्षा), कन्या, तुला (शरद), वृश्चिक, धनु (हेमन्त)। ये वर्ष की छह ऋतुएँ हैं।
अयनज्ञानम्
शिशिरपूर्वमृतुत्रयमुत्तरं ह्ययनमाहुरहश्च तदा परम् ।
भवति दक्षिणमन्यऋतुत्रये निगदिता रजनी मरूता च सा ।।९।।
भवति दक्षिणमन्यऋतुत्रये निगदिता रजनी मरूता च सा ।।९।।
अर्थ : मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष और मिथुन — इन छह राशियों में सूर्य के भ्रमणकाल को छह मास का उत्तरायण कहते हैं, जिसे देवताओं का दिन माना गया है। कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक और धनु — इन छह राशियों में सूर्य के भ्रमणकाल को छह मास का दक्षिणायन कहते हैं, जिसे देवताओं की रात्रि कहा गया है।
अयनकृत्यम्
गृहप्रवेशत्रिदशप्रतिष्ठा विवाहचौलव्रतबन्धपूर्वम् ।
सौम्यायने कर्म शुभं विधेयं यद् गर्हितं तत्खलु दक्षिणे च ।।१०।।
सौम्यायने कर्म शुभं विधेयं यद् गर्हितं तत्खलु दक्षिणे च ।।१०।।
अर्थ : नूतन गृहप्रवेश, देवप्रतिष्ठा, विवाह, मुण्डन, यज्ञोपवीत आदि शुभ कार्य उत्तरायण में करने चाहिए। निन्दित या अशुभ कार्य दक्षिणायन में किए जाते हैं।
तिथिज्ञानम्
प्रतिपच्च द्वितीया च तृतीया तदनन्तरम् ।
चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी चाष्टमी तथा ।।११।।
नवमी दशमी चैवैकादशी द्वादशी ततः ।
त्रयोदशी ततो ज्ञेया ततः प्रोक्ता चतुर्दशी ।।
पौर्णिमा शुक्लपक्षे तु कृष्णपक्षे त्वमा स्मृता ।।१२।।
चतुर्थी पंचमी षष्ठी सप्तमी चाष्टमी तथा ।।११।।
नवमी दशमी चैवैकादशी द्वादशी ततः ।
त्रयोदशी ततो ज्ञेया ततः प्रोक्ता चतुर्दशी ।।
पौर्णिमा शुक्लपक्षे तु कृष्णपक्षे त्वमा स्मृता ।।१२।।
अर्थ : प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी — ये तिथियाँ हैं। शुक्ल पक्ष की पन्द्रहवीं तिथि को पूर्णिमा तथा कृष्ण पक्ष की पन्द्रहवीं तिथि को अमावस्या कहते हैं।
तिथीनां नन्दादिसंज्ञा
नन्दा च भद्रा च जया च रिक्ता पूर्णेति सर्वास्तिथयः क्रमात्स्युः ।
कनिष्ठमध्येष्टफलास्तु शु्क्ले कृष्णे भवन्त्युत्तममध्यहीनाः ।।१३।।
कनिष्ठमध्येष्टफलास्तु शु्क्ले कृष्णे भवन्त्युत्तममध्यहीनाः ।।१३।।
अर्थ : नन्दा (१,६,११), भद्रा (२,७,१२), जया (३,८,१३), रिक्ता (४,९,१४) और पूर्णा (५,१०,१५) — इस प्रकार तिथियों की पाँच संज्ञाएँ हैं। शुक्ल पक्ष में ये क्रमशः कनिष्ठ, मध्यम और इष्ट फल देती हैं तथा कृष्ण पक्ष में उत्तम, मध्यम और हीन फल देती हैं।
नन्दादिषु कृत्यमाह श्रीपतिः
नन्दासु चित्रोत्सववास्तुतन्त्रक्षेत्रादि कुर्वीत तथैव नृत्यम् ।
विवाहभूषाशकटाध्वयाने भद्रासु कार्याण्यपि पौष्टिकानि ।।१४।।
विवाहभूषाशकटाध्वयाने भद्रासु कार्याण्यपि पौष्टिकानि ।।१४।।
अर्थ : नन्दा तिथि में चित्र, उत्सव, वास्तु, तन्त्र और क्षेत्र आदि कार्य शुभ होते हैं। भद्रा तिथि में विवाह, भूषण धारण, वाहन, यात्रा तथा पौष्टिक कार्य शुभ माने गए हैं।
जयासु सङ्ग्रामबलोपयोगिकार्यणि सिद्धयन्ति हि निर्मितानि ।
रिक्तासु विद्विङ्वधबन्धघातविषाग्निशस्त्रादि च यान्ति सिद्धम् ।।१५।।
रिक्तासु विद्विङ्वधबन्धघातविषाग्निशस्त्रादि च यान्ति सिद्धम् ।।१५।।
अर्थ : जया तिथि में संग्राम तथा बलोपयोगी निर्माण कार्य सिद्ध होते हैं। रिक्ता तिथि में शत्रुता (वैर), वध, बन्धन, घात, विष, अग्नि तथा शस्त्र सम्बन्धी कार्य सिद्ध होते हैं।
पूर्णासु माङ्गल्यविवाहयात्राः सशान्तिकं पौष्टिककर्म कार्यम् ।
सदैव दर्शे पितृकर्म युक्तं नान्यद्विदध्याच्छुभमङ्गलादि ।।१६।।
सदैव दर्शे पितृकर्म युक्तं नान्यद्विदध्याच्छुभमङ्गलादि ।।१६।।
अर्थ : पूर्णिमा में सभी प्रकार के मङ्गल कार्य, विवाह, यात्रा तथा शान्तिक और पौष्टिक कर्म सिद्ध होते हैं। अमावस्या में केवल पितृकर्म करना चाहिए, अन्य शुभ कार्य नहीं करने चाहिए।
सिद्धियोगाः
शुक्रे नन्दा बुधे भद्रा जया क्षितिजनन्दने ।
शनौ रिक्ता गुरौ पूर्णा सिद्धयोगाः प्रकीर्तिताः ।।१७।।
शनौ रिक्ता गुरौ पूर्णा सिद्धयोगाः प्रकीर्तिताः ।।१७।।
अर्थ : शुक्रवार को नन्दा (१/६/११), बुधवार को भद्रा (२/७/१२), मंगलवार को जया (३/८/१३), शनिवार को रिक्ता (४/९/१४) और बृहस्पतिवार को पूर्णा (५/१०/१५) हो तो सिद्धयोग बनता है। यह यात्रा के लिए प्रशस्त माना गया है।
मृत्युयोगाः
आदित्य भौमयीनन्दा भद्रा भार्गव चन्द्रयोः ।
बुधे जया गुरौ रिक्ता शनौ पूर्णा च मृत्युदा ।।१८।।
बुधे जया गुरौ रिक्ता शनौ पूर्णा च मृत्युदा ।।१८।।
अर्थ : रविवार और मंगलवार को नन्दा (१/६/११), शुक्रवार और सोमवार को भद्रा (२/७/१२), बुधवार को जया (३/८/१३), बृहस्पतिवार को रिक्ता (४/९/१४) तथा शनिवार को पूर्णा (५/१०/१५) हो तो मृत्युयोग बनता है। इसमें यात्रा नहीं करनी चाहिए।
अमृतयोगाः
चन्द्रर्कयोर्भवेत् पूर्णा कुंजे भद्रा जया गुरौ ।
शनिश्चन्द्रजयोनन्दा भृगौ रिक्ताऽमृताह्वया ।।१९।।
शनिश्चन्द्रजयोनन्दा भृगौ रिक्ताऽमृताह्वया ।।१९।।
अर्थ : रविवार और सोमवार के दिन पूर्णा (५/१०/१५), मंगलवार को भद्रा (२/७/१२), बृहस्पतिवार को जया (३/८/१३), शनिवार और बुधवार को नन्दा — ये अमृतयोग कहलाते हैं। ये यात्रा के लिए अत्यन्त मङ्गलदायक माने गए हैं।

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