🕉️ श्री जगन्नाथाष्टकम्
कदाचित् कालिन्दी - तटविपिन - सङ्गीतकरवो । मुदाभीरी - नारीवदन - कमलास्वाद - मधुपः ।।
रमा - शम्भूब्रह्मा - ऽमरपति - गणेशार्चितपदो । जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु में ।।1।।
भुजे सव्ये वेणु शिरसि - शिखिपृच्छं - कटितटे । दुकुलं नेषान्ते चहचरकटाक्षं विदघते ।।
सदा -श्रीमद्-वृन्दावन् - वसतिलीला - परिचयो । जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु में ।।2।।
महाम्भोधेस्तीरे - कनकरूचिरे - नीलशिखरे । वसन् प्रासादान्तः सहजबलभद्रेण बलिना ।।
सुभद्रामध्यस्थः सकलसुरसेवा - ऽवसरदो । जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु में ।।3।।
कृपापारावारः - सजल-जलद-श्रेणिरूचिरो । रमावाणीराम-स्फुरदमल-पद्मेक्षणमुखैः ।।
सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुतिगण - शिखागीतचरितो । जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु में ।।4।।
रथारूढो गच्छन् पथि मिलित-भूदेवपटलैः । स्तुतिप्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दयासिन्धुर्वन्धुः सकलजगतां सिन्धुसुतया । जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु में ।।5।।
परब्रह्मापीडः कुवलयदलोत्फुल्लनयनो । निवासी नीलाद्री निहितचरणोऽनन्तशिरसि ।
रसानन्दो राधा-सरसवपुरालिङ्गनसुखो । जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥6॥
न वै प्रार्थ्यं राज्यं न च कनकतां भोगविभवं । न याचेऽहं रम्यां निखिलजनकाभ्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथ-पतिना गीतच रितो । जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥7॥
हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते । हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते ।
अहो दीनानाथं निहितमचलं निश्चितपदं । जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥8॥
🌺 इति श्रीशङ्कराचार्यप्रणीतं जगन्नाथाष्टकं सम्पूर्णम् ।। ६२ ।।
📘 जगन्नाथ अष्टकम् लाभ:-)
जब आदि शंकराचार्य प्रथम बार पुरी धाम स्थित जगन्नाथ (श्री कृष्ण) जी के दर्शन के लिए पहुंचे, तो भगवान् को देखकर उन्होंने जगन्नाथ जी की स्तुति की ओर अष्टकम का निर्माण किया | यह जगन्नाथ स्वामी का सबसे अधिक प्रचलित स्तोत्र है । इसे चैतन्य महाप्रभु जी ने गाया जब वह जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए आये थे। यह पावन और शक्तिशाली अष्टक है जिसके पाठमात्र से जगन्नाथ स्वामी प्रसन्न हो जाते है, मनुष्य की आत्मा पापो से मुक्त होकर विशुद्ध हो जाती है । इस अष्टकम के पाठ से आत्मा पवित्र होकर अंत में विष्णु लोक को प्राप्त करती है। हर वैष्णव को मुक्ति देने वाला यह स्तोत्र भगवन जगन्नाथ जी को अतिशय प्रिय है |
( 🕉️(श्री जगन्नाथ आरती) )
चतुर्भुज जगन्नाथ कंठ शोभित कौसतुभः ॥
जगन्नाथ, लोकानाथ, निलाद्रिह सो पारो हरि
दीनबंधु, दयासिंधु, कृपालुं च रक्षकः
कम्बु पानि, चक्र पानि, पद्मनाभो, नरोतमः
जग्दम्पा रथो व्यापी, सर्वव्यापी सुरेश्वराहा
लोका राजो, देव राजः, चक्र भूपह स्कभूपतिहि
निलाद्रिह बद्रीनाथशः, अनन्ता पुरुषोत्तमः
ताकारसोधायोह, कल्पतरु, बिमला प्रीति बरदन्
हा बलभद्रोह, बासुदेव, माधवो मधुसुदना
दैत्यारिः, कुंडरीकाक्षोह, बनमाली बडा प्रियाह, ब्रम्हा बिष्णु, तुषमी
बंगश्यो, मुरारिह कृष्ण केशवः श्री राम, सच्चिदानंदोह,
गोबिन्द परमेश्वरः बिष्णुर बिष्णुर, महा बिष्णुपुर,
प्रवर बिशणु महेसरवाहा लोका कर्ता, जगन्नाथो, महीह करतह महजतहह ॥
महर्षि कपिलाचार व्योह, लोका चारिह सुरो हरिह
वातमा चा जीबा पालसाचा, सूरह संगसारह पालकह एको मीको मम प्रियो ॥
ब्रम्ह बादि महेश्वरवरहा दुइ भुजस्च चतुर बाहू,
सत बाहु सहस्त्रक पद्म पितर बिशालक्षय
पद्म गरवा परो हरि पद्म हस्तेहु, देव पालो
दैत्यारी दैत्यनाशनः चतुर मुरति, चतुर बाहु शहतुर न न सेवितोह....
पद्म हस्तो, चक्र पाणि संख हसतोह, गदाधरह
महा बैकुंठबासी चो लक्ष्मी प्रीति करहु सदा ।
जय श्री जगन्नाथ बाबा


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