सम्पूर्ण शिव पार्थिव पूजन

AnandShastri
0

॥ शिव पार्थिव-पूजन विधि ॥

शिव पार्थिव-पूजन भगवान शिव को शीघ्र प्रसन्न करने की अत्यन्त प्रभावशाली वैदिक विधि है। इस पूजन से पाप क्षय, आयु, आरोग्य, धन-धान्य तथा मनोकामना की पूर्ति होती है।


पूजन प्रारम्भ विधि

हाथ में अक्षत एवं पुष्प लेकर स्वस्त्ययन (स्वस्तिवाचन) तथा गणपति स्मरण करें। इसके पश्चात् दाहिने हाथ में कुश, पुष्प, अक्षत, जल एवं द्रव्य लेकर संकल्प करें।


सकाम संकल्प

विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य दिने अमुक मासे अमुक वर्षे मम नाम आनन्द त्रिपाठीनः अमुक गोत्रः सर्वारिष्टनिरसन पूर्वक सर्वपापक्षयार्थं दीर्घायुरारोग्य धनधान्य पुत्रपौत्रादि समस्त सम्पत्प्राप्त्यर्थं श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्यर्थं श्रीसाम्बसदाशिव प्रीत्यर्थं पार्थिव लिङ्ग पूजनं अहं करिष्ये ॥

निष्काम संकल्प

विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य……….. श्री परमात्म प्रीत्यर्थं पार्थिव लिङ्ग पूजनं अहं करिष्ये ॥


भूमि प्रार्थना

इस प्रकार संकल्प करने के बाद भूमि की प्रार्थना करें –

ऊँ सर्वाधारे देवि त्वद्रूपां मृत्तिकामिमाम् ।
ग्रहीष्यामि प्रसन्ना त्वं लिङ्गार्थं भव सुप्रभे ॥
ऊँ ह्राँ पृथिव्यै नमः

मिट्टी का ग्रहण

उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना ।
मृत्तिके त्वां च गृहण्यामि प्रजया च धनेन च ॥

ऊँ हराय नमः — इस मंत्र को पढ़कर मिट्टी लें। मिट्टी को देखकर कंकड़ आदि निकाल दें। कम से कम 12 ग्राम मिट्टी लेकर जल मिलाकर गूंध लें।


लिङ्ग गठन

ऊँ महेश्वराय नमः कहकर लिङ्ग का गठन करें। यह अंगूठे से छोटा और वित्ते से बड़ा न हो। मिट्टी की छोटी गोली बनाकर लिङ्ग के ऊपर रखें, इसे वज्र कहा जाता है।

प्रतिष्ठा

ऊँ शूलपाणये नमः
हे शिव! इह प्रतिष्ठतो भव।

(यह सामान्य पार्थिव पूजन की सरल प्रतिष्ठा विधि है। विशेष अवसरों पर प्राण-प्रतिष्ठा विधि की जाती है।)


प्राण-प्रतिष्ठा मंत्र विनियोग

ऊँ अस्य श्रीशिवपञ्चाक्षरमन्त्रस्य वामदेव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीसदाशिवो देवता, ओंकारो बीजम्, नमः शक्तिः, शिवाय इति कीलकम्, मम साम्बसदाशिवप्रीत्यर्थं न्यासे पार्थिवलिङ्गपूजने जपे च विनियोगः ॥

इस विनियोग के पश्चात् अपने तथा देवता के अंगों में दूर्वा या कुश से स्पर्श करते हुए न्यास करें।

ऋष्यादि न्यास

ॐ वामदेवर्षये नमः (शिरसि)
ॐ अनुष्टुपछन्दसे नमः (मुखे)
ॐ सदाशिवदेवतायै नमः (हृदि)
ॐ बीजाय नमः (गुह्ये)
ॐ शक्तये नमः (पादयोः)
ॐ शिवाय कीलकाय नमः (सर्वाङ्गे)

करन्यास

ॐ अंगुष्ठाय नमः ।
ॐ नं तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ मं मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ शिं अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ वां कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ यं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

षडङ्गन्यास

ॐ हृदयाय नमः ।
ॐ नं शिरसे स्वाहा ।
ॐ मं शिखायै वषट ।
ॐ शिं कवचाय हुम् ।
ॐ वां नेत्रत्रयाय वौषट ।
ॐ यं अस्त्राय फट् ।

अर्थ — इतना कहकर जल भूमि पर छोड़ दें और पुष्प हाथ में लेकर मूर्ति को स्पर्श करते हुए आगे का मंत्र बोलें।


ध्यान

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं ।
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृतिं वसानं ।
विश्ववाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥

ॐ नागाधीश्वर विष्टरां फणिफणोत्तंसोरूरत्नावली ।
भास्वद् देहलतां दिवाकरनिभां नेत्रत्रयोद्भासिताम् ।
माला कुम्भ कपाल नीरजकरां चन्द्रार्धचूडां पराम् ।
सर्वज्ञेश्वर भैरवाङ्कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये ॥


विनियोगः

ॐ अस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठा मन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऋषयः, ऋग्यजुः सामानि छन्दांसि, क्रियामयवपुः प्राणाख्या देवता, आँ बीजं ह्रीं शक्तिः कौं कीलकं देव-देवी प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः ॥


प्राणप्रतिष्ठा

ॐ ब्रह्माविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः (शिरसि) ।
ॐ ऋग्यजुःसामच्छन्दोभ्यो नमः (मुखे) ।
ॐ प्राणाख्यदेवतायै नमः (हृदि) ।
ॐ आँ बीजाय नमः (गुह्ये) ।
ॐ ह्रीं शक्तये नमः (पादयोः) ।
ॐ क्रौं कीलकाय नमः (सर्वाङ्गेषु) ।

अर्थ — इस प्रकार न्यास करने के  पुनः पार्थिव लिङ्ग का स्पर्श करें । 

ॐ आँ ह्रीं क्रौं यँ रँ लँ वँ शँ षँ सँ हँ सः सोऽहं शिवस्य प्राणा इह प्राणाः ॥

ॐ आँ ह्रीं क्रौं यँ रँ लँ वँ शँ षँ सँ हँ सः सोऽहं शिवस्य जीव इह स्थितः ॥

ॐ आँ ह्रीं क्रौं यँ रँ लँ वँ शँ षँ सँ हँ सः सोऽहं शिवस्य सर्वेन्द्रियाणि वाङ्मनस्त्वक्चक्षुःश्रोत्रघ्राणजिह्वा
पाणिपादपायूपस्थानि इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ॥


अर्थ — प्राण - प्रतिष्ठा करने के पश्चात् हाथ में अक्षत ( चावल ) लेकर आवाहन करें । 

आवाहन

ॐ भूः पुरुषं साम्बसदाशिवमावाहयामि ।
ॐ भूः पुरुषं साम्बसदाशिवमावाहयामि ।
ॐ भूः पुरुषं साम्बसदाशिवमावाहयामि ।

ॐ स्वामिन् सर्वजगन्नाथ यावत्पूजावसानकम् ।

तावत्त्वं प्रीतिभावेन लिङ्गेऽस्मिन् संनिधिं कुरु ॥

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

shastrianand701@gmail.com

एक टिप्पणी भेजें (0)
3/related/default