स्वामी परमहंस आरती टीकरमाफी

AnandShastri
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🌺 श्री स्वामी परमहंस जी महराज का संक्षिप्त इतिहास 🌺

हमारा देश संसार की वह पावन भूमि है जहाँ अतीतकाल से ऐसे नर-नारी जन्म लेते आये हैं, जो अपने त्याग, तपस्या, वीरता और सेवा से देवताओं के समान उच्च हो गये हैं । उन्हीं में से हमारे परम श्रद्धेय स्वामी श्री परमहंस जी महराज भी हैं, जो अपनी कठोर तपस्या के कारण देवताओं के समान पूजनीय हो गये । आपका जन्मस्थान ग्राम-कल्याणपुर, तहसील-मुसाफिरखाना, जनपद-सुलतानपुर है। आपके पिता श्री रामानन्द द्विवेदी जी व्याकरण एवं ज्योतिष शास्त्र के अद्वितीय विद्वान थे। आप एक कुलीन घराने में जन्म लेकर अपनी तपस्या से अभूतपूर्व ख्याति को प्राप्त हुए।


आपके छोटे भाई स्वामी श्री गणेशानन्द जी महाराज हैं, जिन्होंने ग्राम कल्याणपुर में अपना आश्रम स्थापित किया है। आपके माता-पिता का स्वर्गवास हो चुका है । आप मात्र 15 वर्ष की अवस्था में ही गृह-त्याग कर निकल पड़े और घने जंगलों एवं पर्वतों की गुफाओं में भ्रमण करते हुए कठोर तपस्या की। परमपिता परमात्मा की असीम अनुकम्पा से आपका पूर्ण मनोरथ सिद्ध हुआ । तत्पश्चात आपने “परोपकाराय सतां विभूतयः” को अपना जीवन-सिद्धान्त बनाया और मानव समाज के दुःखों को सुनकर उन्हें दूर किया । अल्पकाल में ही आपकी उज्ज्वल कीर्ति-किरणें सम्पूर्ण संसार में व्याप्त हो गयीं। यह परम सौभाग्य की बात है कि आपने टीकरमाफी में अपना आश्रम स्थापित किया, जहाँ गोशाला एवं संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की गयी । यह संस्कृत विद्यालय एक आदर्श संस्थान है, जो एक महान अरण्य के मध्य स्थित होकर प्राचीन गुरुकुलों की स्मृति कराता है। यहाँ प्रथमा से आचार्य तक की निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जाती है तथा विद्यार्थियों को भोजन-दान भी दिया जाता है । आप इस पंचभौतिक शरीर को त्यागकर फाल्गुनी शुक्ल पक्ष त्रयोदशी, मंगलवार, सायं 07 बजे स्वर्गलोक को प्रस्थान कर गये । आपकी पुण्यस्मृति में प्रत्येक वर्ष फाल्गुन शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को श्री रुद्र महायज्ञ का भव्य अनुष्ठान किया जाता है । आपके स्वर्गारोहण के पश्चात एक दिव्य समाधि का निर्माण किया गया, जहाँ महात्मा, आचार्य, विद्यार्थी एवं दर्शनार्थी प्रतिदिन प्रातः एवं सायं स्तुति करते हैं । स्तुति के उपरान्त प्रसाद का वितरण किया जाता है। यद्यपि स्वामी जी की कीर्ति का वर्णन सूर्य को दीपक दिखाने के समान है, फिर भी यथाशक्ति प्रतिदिन होने वाली स्तुति को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

🌺 श्री स्वामी परमहंस स्तुति 🌺

योऽहर्दिवं पोषयते जनानां, वृन्दं स्वपोषं शरणागतानाम् ।
संतर्पयन् स्वस्वमनोरथैश्च, तस्मै नमः स्वामिवराय नित्यम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ: जो शरण में आए हुए जनसमूह के प्रति अभिलाषाओं की पूर्ति करते थे और अपने ही धन से सबका पोषण करते थे, उन सर्वश्रेष्ठ श्री स्वामी जी को नित्य प्रणाम है।


संलग्न चित्तं सुरवाक् प्रचारे, श्रीसच्चिदानन्दविचार चेताः ।
योस्त्यत्र लोके करुणावतारं, तस्मै नमः स्वामिवराय नित्यम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ: संस्कृत विद्या के प्रचार में तथा ब्रह्म विवेचन में ही जिनका चित्त सदैव लगा रहता था और जो इस लोक में साक्षात करुणा के अवतार थे, उन सर्वश्रेष्ठ श्री स्वामी जी को नित्य प्रणाम है ।


मानापमानेऽपि च शत्रु - मित्रे, लाभेप्यलाभेऽपि च तुल्य वृत्तिः ।
योऽशेष जीवेषु च साधु शीलः, तस्मै नमः स्वामिवराय नित्यम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ: जो मान-अपमान, शत्रु-मित्र, लाभ- हानि को एक बराबर मानते थे और सब जीवों पर साधुता का व्यवहार करते थे, उन सर्वश्रेष्ठ श्री स्वामी जी को नित्य प्रणाम है ।


यः सन्ततं तर्पयते सुराणां वृन्दं जगत्पावनमीश्वरञ्चं ।
सायं च प्रातर्निगमाग्निहोत्रैः, तस्मै नमः स्वामिवराय नित्यम् ॥

हिन्दी अर्थ: जो जगत को पालन करने वाले, देव समूह को और ईश्वर को सायं काल और प्रातःकाल वेदपाठ तथा अग्निहोम के द्वारा तृप्त करते थे उन सर्वश्रेष्ठ श्री स्वामी जी को नित्य प्रणाम है ।


घर्मं च शीतं सहते च वृष्टिं, गच्छन् श्वभिरछात्रवरैश्च भूमिम् ।
योऽहर्दिवं दीनदयालु दृष्टिः, तस्मै नमः स्वामिवराय नित्यम् ॥

हिन्दी अर्थ: जो कुत्तों एवं श्रेष्ठ छात्रों के साथ पृथ्वी पर विचरते हुए धूप, शीत एवं वर्षा को सहते थे तथा प्रतिदिन जिनकी दीनों पर दया दृष्टि रहती थी उन सर्वश्रेष्ठ श्री स्वामी जी को नित्य प्रणाम है ।


यस्यार्थिनोयान्ति नखिन्नचित्ताः, शत्रुश्चनस्यादिहकोऽपिबन्धुः ।
श्रीमन्महाराजधुरन्धराय, तस्मै नमः स्वामिवराय नित्यम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ: जिनके यहाँ याचक लोग आकर कभी भी निराश होकर नहीं लौटे और न जिनका कोई मित्र था न शत्रु, उन सर्वसमर्थ सर्वश्रेष्ठ श्री स्वामी जी को नित्य प्रणाम है ।


मध्येयतीनां परिवर्णनीयः, सद्भिः समस्तैरपिवन्दनीयः ।
योऽसौ परिव्राजकराजराजः, तस्मै नमः स्वामिवराय नित्यम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ: जो सम्पूर्ण सन्यासियों के मध्य वर्णनीय थे तथा सम्पूर्ण सज्जनों से वन्दनीय थे और योगियों के योगिराज थे उन सर्वश्रेष्ठ श्री स्वामी जी को नित्य प्रणाम है ।


यद् दर्शनं श्रेष्ठकरं नराणां, यद् ब्रह्मचर्यं भुवि नास्त्यनेकम् ।
यस्मिन्न कामादि गणोपवेशः, तस्मै नमः स्वामिवराय नित्यम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ: जिनका दर्शन मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ बनाने वाला था और जिनमें किसी प्रकार का कामादि (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य) का प्रवेश भी नहीं हुआ था । उन सर्वश्रेष्ठ श्री स्वामी जी को नित्य प्रणाम है।


स्वामिन् त्वदीयौ चरणाब्जकेशरौ, सुशोभितौ रक्त नखावलीकुलैः ।
मुहुर्मुहुर्योगिकराभिलालितौ, पुनः पुनः काञ्छति मन्मधुव्रतः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ: हे स्वामिन्! आपके चरणारविन्द के केशर, जो लाल-लाल नखसमूहों से सुशोभित हैं और योगियों के करों से बार-बार पूजित होते हैं, उन्हें भ्रमररूपी मैं, आपका अनन्य सेवक, सदैव प्राप्त करना चाहता हूँ।


विजेजीयतां पाठशाला दिगन्ते, अधीतां सुखैश्छात्रमालाचिरन्ते ।
चिरन्टीव कीर्तिः सदानूतना ते, हसन्ती रमन्ती विरामं न यायात् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ: आपका विद्यालय सर्वत्र विजयी रहे, छात्रवृन्द सुखपूर्वक सदैव अध्ययन करते रहें और युवती के समान आपकी नित्य नूतन कीर्ति हँसती हुई सर्वत्र रमण करे, कभी भी विश्राम न करे ।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव,त्वमेव वन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव,त्वमेव सर्व मम देव देव ॥


॥ दोहा ॥

बार-बार बर मागहुँ, हरषि देहुँ श्रीरंक ।
पद सरोज अनपायनी, भक्ति सदा सत्संग ॥

नहिं विद्या नहिं बाहुबल, नहिं खरचन को दाम ।
मोसम पतित अनाथ के, पति राखहुँ भगवान ॥

अर्थ न धर्म न काम रुचि, गति न चहहुँ निर्वान ।
जन्म जन्म श्री स्वामि पद, यह अन्तिम वरदान ॥

सुनहुँ राम रघुनाथ जी, तुम लग मेरी दौर ।
जैसे काग जहाज को, सूझत और न ठौर ॥

हरहुँ सकल दुख, सुख करहुँ, देखि दीनता मोरि ।
मैं सेवक तुम स्वामि मम, विनय करहुँ कर जोरि ॥

तुम बिन मेरा कौन है, हे अनाथ के नाथ ।
इस असार संसार से, पकरि उबारहुँ हाँथ ॥


॥ कवित्त ॥

पितु मातु सहायक स्वामि सखा, तुमही एक नाथ हमारे हो ।

जिनके कछु और अधार नहीं, तिनके तुम ही रखवारे हो ।

प्रतिपाल करौं सिगरे जग को, अतिशय करुणा उर धारे हो ।

भुलिहौं हमही तुमको, तुम तो, हमरी सुधि नाहिं बिसारे हो ।

उपकारन को कछु अन्त नहीं, क्षण ही क्षण जो विस्तारे हो ।

महराज महामहिमा तुम्हरी, समुझे विरलै बुधि वारे हो ।

शुभ शान्तिनिकेतन प्रेमनिधे, मन मन्दिर के उजियारे हो ।

इस जीवन के तुम जीवन हो, इन प्राणन से तुम प्यारे हो ॥


॥ दोहा ॥

नाथ एक बर मागहुँ, मोहि कृपा करि देहुँ ।
जन्म जन्म श्री स्वामि पद, कबहुँ न घटिय सनेह ॥

मो सम दीनन दीन हित, तुम समान रघुवीर ।
अस बिचारि रघुवंशमणि, हरहुँ सकल भवभीर ॥

श्रवण सुयश सुनि आयहुँ, प्रभु भंजव भव भीर ।
त्राहि-त्राहि आरति हरन, परमहंस मतिधीर ॥

आपन दारुण दीनता, सबहिं कहेहुँ समुझाइ ।
बिनु देखे श्री स्वामि पद, जिय की जरनि न जाइ ॥



श्रीरामचन्द्र स्तुति

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं,
नवकंज लोचन कंजमुख करकंज पद कंजारुणं ॥

अर्थ —
हे मन! करुणामय श्रीरामचन्द्र जी का भजन करो, जो संसार के भयंकर भय को हरने वाले हैं। जिनकी आँखें नवीन कमल के समान, मुख कमल जैसा तथा हाथ-पाँव लाल कमल के समान शोभायमान हैं।


कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरं,
पटपीत मानहुँ तड़ित रुचि सुचि नौमि जनक सुतावरं ॥

अर्थ —
जिनकी शोभा असंख्य कामदेवों से भी अधिक है, जो नवीन नील मेघ के समान सुन्दर हैं। पीत वस्त्र धारण किए हुए वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो मेघों के मध्य बिजली चमक रही हो। ऐसे जनकनन्दिनी सीता जी के स्वामी श्रीराम को मैं प्रणाम करता हूँ।


भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्यवंश निकन्दनं,
रघुनन्द आनन्द कन्द कौशलचन्द दशरथ नन्दनं ॥

अर्थ —
जो दीनों के बन्धु हैं, सूर्यवंश के भूषण हैं, दानव-दैत्य कुल का नाश करने वाले हैं। रघुकुल के आनन्दस्वरूप, कौशल देश के चन्द्रमा और दशरथ जी के पुत्र हैं।


सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदार अंग विभूषणं,
आजानुभुज सर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं ॥

अर्थ —
जिनके सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल, मस्तक पर सुन्दर तिलक शोभित है। जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी हैं और जो धनुष-बाण धारण कर युद्ध में खर-दूषण जैसे वीरों को जीतने वाले हैं।


इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्,
मम् हृदय कंज निवास कुरु कामादि खल दल गंजनम् ॥

अर्थ —
तुलसीदास जी कहते हैं— हे प्रभु! आप शंकर, शेष और मुनियों के मन को आनन्द देने वाले हैं। कृपा करके मेरे हृदय-कमल में निवास करें और काम आदि दुष्ट विकारों का नाश करें।


स्तुति-श्लोक

नीलाम्बुजस्यामलकोमलांगम्, सीता समारोपितवामभागम् ।
पाणीमहाशायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम् ॥


कर्पूरगौरं करुणावतारं, संसार सारं भुजगेन्द्रहारम् ।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानी सहितं नमामि ॥


अच्युतं केशवं राम नारायणं, कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिम् ।
श्रीधरं माधवं गोपिकाबल, जानकी नायक रामचन्द्रं भजे ॥


श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव ।
हरे मुरारे मधुकैटभारे, निराश्रयं माम जगदीश रक्ष ॥


सशंखचक्रं सकिरीट कुण्डलं, सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् ।
सहार वक्षस्थल कौस्तुभश्रियं, नमामि विष्णुं शिरसां चतुर्भुजम् ॥


त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥


हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे स्वामिन् हरे स्वामिन् स्वामिन् स्वामिन् हरे हरे ॥


शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम् ।
विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभांगम् ॥
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् ।
वन्दे विष्णुं भवभयहरणं सर्वलोकैकनाथम् ॥


ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्ठदोहं, तीर्थास्पदं शिवविरिंचि नुतं शरण्यम् ।
भृत्यार्थिहं प्रणतपाल भवाब्धिपोतं, वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम् ॥


लोकाभिरामं रणरंगधीरं, राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरूपं करुणाकरन्तं, श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥


हे नाथ नारायण दीनबन्धो, कृपाविधेयामयि पापसिन्धौ ।
निरर्थकं जन्मगतं मदीयं, न चिन्तितं ते चरणारविन्दम् ॥

॥ श्रीरुद्राष्टकम् ॥

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् । निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥1॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं, गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् । करालं महाकाल कालं कृपालं, गुणागार संसारपारं नतोऽहम् ॥2॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरम् । स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा, लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥3॥

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् । मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥4॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं, अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् । त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥5॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी । चिदानन्द संदोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥6॥

न यावत् उमानाथ पादारविन्दं, भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् । न तावत् सुखं शान्ति सन्तापनाशं, प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥7॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां, नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् । जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥8॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये । ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥


॥ कवित्त ॥

दीन हितकारी सुख सम्पदा के देनहार,
परमहंस स्वामी को प्रताप जग छायो है ॥
हार गए हैं आय डिप्टी कलक्टर सब,
पक्का मकान टीकरमाफी में बनायों हैं ॥
पशु-पक्षी नर और कुक्कुर बिलारिन को,
धर्मपाल महराज भोजन करायो हैं ॥
सूर्य के समान ज्योति जगमगात जगत माहिं,
सेवक रामरतन कवि गुणानुबाद गायो है ॥

नाम लिए कितने तरि जात,
प्रणाम किये सुरलोक सिधारे ॥
दूर बसौ तो कहा लौ कहों,
कितने तरि जात चरण के सहारे ॥

दीन दयाल स्वभाव तेरा, लखि दीन कवी तो प्रण उरधारे ।
हे करुणेश मैं दोष भरे, पै भरोस यहीं कि परोस तिहारे ॥


॥ दोहा ॥

टीका सब आश्रमन का, टीकरमाफी आज ।
मनवांक्षित फल देत हैं, परमहंस महराज ॥

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