अथ शिव संकल्पसूक्तम्

AnandShastri
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रुद्रसूक्तम् अर्थ सहित | Rudra Suktam in Hindi | वैदिक शिव स्तोत्र

॥ रुद्रसूक्तम् ॥

हरिः ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः ।
बाहुभ्यामुत ते नमः ॥ १ ॥
अर्थ हे रुद्र! आपके क्रोध को नमस्कार है, आपके बाण को नमस्कार है और आपकी भुजाओं को भी मेरा प्रणाम है।

ॐ या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ।
तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ २ ॥
अर्थ हे रुद्र! आपकी जो कल्याणकारी, अहिंसक और पापों को नष्ट करने वाली देह है, उसी शान्त स्वरूप से आप हम पर कृपा करें।

ॐ यामिषुं गिरिशन्त हस्ते शिवां गिरित्र तां कुरु ।
मा हिंसीः पुरुषं जगत् ॥ ३ ॥
अर्थ हे गिरिशन्त! आपके हाथ में स्थित बाण को कल्याणकारी बना दीजिए और इस संसार के किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाइए।

ॐ शिवेन वचसा त्वा गिरिशाऽच्छावदामसि ।
यथा नः सर्वमिज्जगद् अयक्ष्मं सुमना असत् ॥ ४ ॥
अर्थ हे गिरिश! हम आपको मंगलमय वचनों से पुकारते हैं, जिससे यह सम्पूर्ण जगत रोगरहित और प्रसन्न हो।

ॐ अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्योभिषक् ।
अहीँश्च सर्वाञ्जम्भयन् सर्वाश्च यातुधान्यः परासुव ॥ ५ ॥
अर्थ प्रथम दिव्य वैद्य रुद्र सभी सर्पों, राक्षसी और बाधक शक्तियों का नाश करें।

ॐ असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमङ्गलः ।
ये चैनं रुद्राअभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशः तेषां हेड ईमहे ॥ ६ ॥
अर्थ जो ताम्र, अरुण और भूरे वर्ण वाले मंगलकारी रुद्र सहस्रों रूपों में दिशाओं में स्थित हैं, उनके क्रोध से हमारी रक्षा हो।

ॐ असौ योऽवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः ।
स दृष्टो मृडयाति नः ॥ ७ ॥
अर्थ जो नीलग्रीव और लालवर्ण रुद्र सर्वत्र विचरण करते हैं, वे जहाँ भी दृष्टिगोचर हों, वहाँ हम पर कृपा करें।

ॐ नमोऽस्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे ।
अथो ये अस्य सत्वानोऽहं तेभ्योऽकरन्नमः ॥ ८ ॥
अर्थ नीलग्रीव, सहस्रनेत्र और वरदायक रुद्र को नमस्कार है। उनके समस्त गणों को भी मेरा प्रणाम है।

ॐ प्रमुञ्च धन्वनस्त्वमुभयोरार्त्न्योर्ज्याम् ।
याश्च ते हस्त इषवः परा ता भगवो वप ॥ ९ ॥
अर्थ हे भगवन्! अपने धनुष की प्रत्यंचा ढीली करें और अपने बाणों को हमसे दूर रखें।

ॐ विज्यं धनुः कपर्दिनो विशल्यो बाणवाँ उत ।
अनेशन्नस्य या इषव आभुरस्य निषङ्गधिः ॥ १० ॥
अर्थ हे कपर्दी रुद्र! आपका धनुष बिना प्रत्यंचा का हो, बाण निष्फल हों और तरकस खाली रहे।

ॐ या ते हेतिर्मीढुष्टम हस्ते बभूव ते धनुः ।
तयास्मान्विश्वतस्त्वमयक्ष्मया परिभुज ॥ ११ ॥
अर्थ हे वरदायक रुद्र! आपके हाथ का वह बाण हमें चारों ओर से रोगों से मुक्त करे।

ॐ परि ते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वतः ।
अथो य इषुधिस्तवारे अस्मन्निधेहि तम् ॥ १२ ॥
अर्थ हे रुद्र! आपके बाण हमें स्पर्श न करें और आपका तरकस हमसे दूर रहे।

अवतत्य धनुष्ट्वं सहस्राक्ष शतेषुधे ।
निशीर्य शल्यानां मुखा शिवो नः सुमना भव ॥ १३ ॥
अर्थ हे सहस्रनेत्र! अपना धनुष नीचे रखें, बाणों के मुख कुंद करें और हमारे लिए कल्याणकारी बनें।

ॐ नमस्त आयुधायानातताय धृष्णवे ।
उभाभ्यामुत नमो बाहुभ्यां तव धन्वने ॥ १४ ॥
अर्थ हे आयुधधारी, पराक्रमी रुद्र! आपकी भुजाओं और धनुष को मेरा नमस्कार है।

ॐ मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम् ।
मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तनवो रुद्र रीरिषः ॥ १५ ॥
अर्थ हे रुद्र! हमारे बड़े-छोटे, माता-पिता और प्रियजनों को कभी भी कष्ट न पहुँचाएँ।

ॐ मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः ।
मा नो वीरान् रुद्र वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥ १६ ॥
अर्थ हे रुद्र! हमारे बालकों, आयु, गौ, अश्व और वीरों को हानि न पहुँचाएँ। हम यज्ञ की आहुति के साथ सदा आपको पुकारते हैं।

॥ इति रुद्रसूक्तं समाप्तम् ॥

रुद्रसूक्तम् ऋग्वेद का अत्यन्त शक्तिशाली वैदिक सूक्त है, जिसमें भगवान रुद्र (शिव) की उग्र एवं कल्याणकारी शक्तियों का वर्णन है। इसका पाठ रोग, भय, अकाल मृत्यु और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है। यहाँ रुद्रसूक्तम् का शुद्ध संस्कृत पाठ और सरल हिन्दी अर्थ प्रस्तुत है।

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