श्री शिवमहिम्नस्तोत्रम् पाठ

AnandShastri
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शिवमहिम्न स्तोत्रम् – मूल पाठ

(पुष्पदन्त गन्धर्व कृत)

पुष्पदंत उवाच

श्लोक १
महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी।
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः॥
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिमाणावधि गृणन्।
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥1॥
अर्थ :
हे प्रभु! बड़े-बड़े विद्वान और योगीजन भी आपकी महिमा को नहीं जान पाए, तो मैं तो एक साधारण जीव हूँ। फिर भी प्रत्येक भक्त को अपनी बुद्धि और भावना के अनुसार आपकी स्तुति करने का अधिकार है। हे भोलेनाथ! आप मेरे भाव को देखकर इस स्तुति को स्वीकार करें।
श्लोक २
अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः।
रतदव्यावृत्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि॥
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधिगुणः कस्य विषयः।
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः॥2॥
अर्थ :
हे शिव! आपकी महिमा मन और वाणी से परे है। वेद भी आपको ‘नेति-नेति’ कहकर व्यक्त करते हैं। फिर भी जब आप साकार रूप में प्रकट होते हैं, तो भक्त प्रेमवश आपके गुणों का गान करते हैं।
श्लोक ३
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत:।
स्तवब्रह्मन्किवागपि सुरगुरोविस्मयपदम्॥
मम त्वेतां वाणों गुणकथनपुण्येन भवतः।
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता॥3॥
अर्थ :
हे वेदों के स्रष्टा! आपने अमृतमय वेदों की रचना की है। मैं भी अपनी सीमित बुद्धि से आपके गुणों का गान कर रहा हूँ, जिससे मेरी वाणी पवित्र हो रही है।
श्लोक ४
तवैश्वर्यं तत्तज्जगदुदयरक्षा प्रलयकृत्।
त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासुतनुषु॥
अभव्यानामस्मिन्वरद रमणीयामरमणीम्।
विहन्तु व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः॥4॥
अर्थ :
हे देव! आप ही सृष्टि के सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। फिर भी अज्ञानी लोग आपके विषय में निरर्थक तर्क करते रहते हैं।
श्लोक ५
किमीहः किङ्कायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनम्।
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च॥
अतक्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः।
कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः॥5॥
अर्थ :
हे महादेव! सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर जो व्यर्थ तर्क किए जाते हैं, वे केवल भ्रम फैलाते हैं। वास्तव में यह सब आपकी दिव्य शक्ति का ही विस्तार है।
श्लोक ६
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां।
मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति॥
अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो।
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे॥6॥
अर्थ :
हे परमपिता! यह सातों लोक आपके द्वारा ही रचे गए हैं। इस विचित्र संसार की रचना-सामग्री किसी अन्य के पास हो ही नहीं सकती। इसलिए आपके विषय में संदेह करना केवल अज्ञान का परिणाम है।
श्लोक ७
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति।
प्रभिन्न प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च॥
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥7॥
अर्थ :
हे शिव! आपको पाने के अनेक मार्ग हैं—वेद, सांख्य, योग, शैव, वैष्णव आदि। लोग अपनी रुचि के अनुसार मार्ग चुनते हैं, परन्तु जैसे सभी नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, वैसे ही सभी मार्ग अंततः आप तक ही पहुँचाते हैं।
श्लोक ८
महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः।
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्॥
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्रू प्रणिहिताम्।
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति॥8॥
अर्थ :
हे शिव! देवता आपके संकेत से ऐश्वर्य भोगते हैं, पर आप स्वयं भस्म, व्याघ्रचर्म, खप्पर और वृषभ को धारण करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि जो आत्मानंद में स्थित होता है, वह संसार के भोगों में नहीं फँसता।
श्लोक ९
ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदम्।
परोधौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये॥
समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैर्विस्मित इव।
स्तुवन्भ्यां त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता॥9॥
अर्थ :
हे त्रिपुरहंता! कोई संसार को नित्य कहता है, कोई अनित्य। मत भिन्न हो सकते हैं, पर आपके भक्त आपको ही परम सत्य मानते हैं। मैं भी उसी सत्य का समर्थन करता हूँ।
श्लोक १०
तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरिविरञ्चिर्हरिरधः।
परिच्छेत्तु यातावनलमनलस्कन्धवपुषः॥
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्।
स्तयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति॥10॥
अर्थ :
हे प्रभु! ब्रह्मा और विष्णु भी आपके अग्निस्तंभ स्वरूप का अंत नहीं जान सके। अंततः श्रद्धा से आपकी स्तुति की, तब आपने अपना स्वरूप प्रकट किया। निश्चय ही सच्ची भक्ति कभी निष्फल नहीं होती।
श्लोक ११
अयत्नादापाद्यत्रिभुवनमवैरव्यतिकरम्।
दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान्॥
शिरः पद्मश्रेणोरचितचरणाम्भोरुहबलेः।
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर वियस्फूर्जितमिदम्॥11॥
अर्थ :
हे त्रिपुरान्तक! आपके परम भक्त रावण ने पद्मों के स्थान पर अपने नौ-नौ मस्तक आपकी पूजा में अर्पित कर दिए। दसवाँ मस्तक अर्पित करने से पूर्व आपने उसे दर्शन देकर वरदान दिया, जिससे उसकी भुजाओं में अपार बल उत्पन्न हुआ। यह सब आपकी दृढ़ भक्ति का ही प्रतिफल था।
श्लोक १२
अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनम्।
बलाकैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः॥
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलिताङ्गुष्ठशिरसि।
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद्ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः॥12॥
अर्थ :
हे शिव! आपकी भक्ति से रावण को अपार बल प्राप्त हुआ, पर उसने विवेक खोकर कैलास पर्वत उठाने का प्रयास किया। आपने मात्र अपने पैर के अंगूठे से उसे दबा दिया, जिससे वह पाताल में जा गिरा। अनधिकृत शक्ति मनुष्य को विवेकहीन बना देती है।
श्लोक १३
यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद! परमोच्चैरपि सती।
मधश्चक्र बाणः परिजनविधैयस्त्रिभुवनः॥
नतच्चित्रं तस्मिन्वरिवसिरित्वच्चरणयोः।
न कस्याप्युन्नत्यं भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः॥13॥
अर्थ :
हे शम्भो! आपकी कृपा से बाणासुर इन्द्र से भी अधिक ऐश्वर्यवान बना। जो भी श्रद्धा से आपके चरणों में शीश झुकाता है, उसकी उन्नति और समृद्धि निश्चित हो जाती है।
श्लोक १४
अकाण्डः ब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा।
विधेयस्यासीद्यस्त्रिनयन विषं संहतवतः॥
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो।
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवनभयभगव्यसनिनः॥14॥
अर्थ :
हे प्रभु! समुद्र मंथन से निकले विष को आपने पीकर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की। कंठ में नीला चिन्ह आपकी शोभा को घटाता नहीं, अपितु और बढ़ा देता है। जो दूसरों के दुःख हरता है, उसका विकार भी पूजनीय बन जाता है।
श्लोक १५
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे।
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः॥
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्।
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः॥15॥
अर्थ :
हे प्रभु! कामदेव के बाणों से कोई नहीं बच पाया, पर जब उसने आपको लक्ष्य किया, तो आप द्वारा भस्म कर दिया गया। श्रेष्ठ जनों का अपमान कभी हितकारी नहीं होता।
श्लोक १६
मही पादाघाताद्व्रजति सहसा संशयपदम्।
पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम्॥
मुहुर्योदौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा।
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता॥16॥
अर्थ :
हे नटराज! आपके तांडव से पृथ्वी, ग्रह, नक्षत्र और स्वर्ग लोक काँप उठते हैं। संपूर्ण जगत की रक्षा के लिए आपका यह प्रचंड स्वरूप भी कल्याणकारी ही है।
श्लोक १७
वियद्व्यापीतारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः।
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते॥
जगद्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति।
त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिमदिव्यं तव वपुः॥17॥
अर्थ :
हे शिव! स्वर्ग से उतरती गंगा आपके शीश पर एक बिंदु समान प्रतीत होती है, पर पृथ्वी पर उतरकर विशाल द्वीपों और समुद्रों का निर्माण करती है। यह आपके दिव्य और अनन्त महिमा वाले स्वरूप का प्रमाण है।
श्लोक १८
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिनगेन्द्रो धनुरथा।
रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति॥
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधिः।
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः॥18॥
अर्थ :
हे शिव! त्रिपुर का नाश करने हेतु आपने पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी, सूर्य-चन्द्र को पहिए, मेरु पर्वत को धनुष और विष्णु को बाण बनाया। हे शम्भो! आपके लिए यह सब केवल लीला मात्र थी, क्योंकि आप किसी सहायता के अधीन नहीं हैं।
श्लोक १९
हरिस्ते साहस्रं कमलबलिमाधाय पदयोः।
यदेकोने तस्मिन्निजमुदहरन्नेत्रकमलम्॥
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा।
त्रयाणां रक्षायं त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्॥19॥
अर्थ :
हे शिव! सहस्र कमलों से आपकी पूजा करते समय एक कमल कम पड़ने पर विष्णु ने अपनी आँख अर्पित कर दी। उनकी यही भक्ति सुदर्शन चक्र बनी। हे त्रिपुरहर! आप तीनों लोकों की रक्षा हेतु सदा जाग्रत रहते हैं।
श्लोक २०
क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमताम्।
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते॥
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवम्।
श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः॥20॥
अर्थ :
हे शिव! यज्ञ की समाप्ति पर आप ही फल प्रदान करते हैं। आपकी उपासना के बिना कोई कर्म फलदायी नहीं होता। इसी कारण वेदों में श्रद्धा के साथ आपको फलदाता मानकर कर्म करने की शिक्षा दी गई है।
श्लोक २१
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृताम्।
सृविणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः॥
क्रतुनष्टस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो।
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः॥21॥
अर्थ :
हे प्रभु! यद्यपि आपने यज्ञ और उसके फल का विधान बनाया, पर जो यज्ञ आपकी अवहेलना से किया जाता है, वह विनाशकारी हो जाता है। इसी कारण दक्ष का यज्ञ नष्ट हुआ। भक्ति रहित यज्ञ सदा अहितकर होता है।
श्लोक २२
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकंस्त्वां दुहितरम्।
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा॥
धनुः पाणेर्यातं दिवमपि सपत्नाकृतममुम्।
त्रसन्तन्तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः॥22॥
अर्थ :
हे शिव! मृग रूप में ब्रह्मा को उनकी पुत्री के प्रति आसक्त देखकर आपका छोड़ा हुआ बाण आज भी मृगशिरा नक्षत्र रूप में आकाश में स्थित है।
श्लोक २३
स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्।
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि॥
यदिस्त्रैणं देवो यमनिरतदेहार्धघटनात्।
अवैति त्वामद्धावत वरद मुग्धा युवतयः॥23॥
अर्थ :
हे त्रिपुरनाशक! कामदेव को आपने तृणवत् भस्म कर दिया। यदि फिर भी कोई युवती यह समझे कि आप उस पर मोहित हैं, तो यह उसका भ्रम मात्र है।
श्लोक २४
श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः।
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः॥
अमंगल्यं शीलं तव भवतु ना मैवमखिलम्।
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मंगलमसि॥24॥
अर्थ :
हे भोलेनाथ! श्मशान, भस्म, भूत-प्रेत ये सब देखने में अमंगल प्रतीत होते हैं, पर जो आपका स्मरण करता है, उसके लिए आप सदा मंगलकारी हैं।
श्लोक २५
मनः प्रत्यविचत्त सविधमवधायात्तमरुतः।
प्रहष्यद्रोमाणः प्रमदसलिल्लोत्संगितदृशः॥
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्ज्यामृतमये।
यधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत्किल भवान्॥25॥
अर्थ :
हे शिव! जैसे अमृतमय सरोवर में स्नान से सब क्लेश नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही योगी जब आपको तत्त्व रूप में देखते हैं, तो परम आनन्द का अनुभव करते हैं।
श्लोक २६
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः।
त्वमापस्त्वं व्योमत्वमुधरणिरात्मा त्वमिति च॥
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरम्।
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत्त्वं न भवसि॥26॥
अर्थ :
हे शिव! आप ही सूर्य, चन्द्र, अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश हैं। आप ही आत्मा भी हैं। हे देव! ऐसा कुछ भी नहीं है जो आप न हों।
श्लोक २७
त्रयीं तिस्रो वृत्तिस्त्रिभुवनमथोत्रीनपि सुरान्।
नकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत्तीर्णविकृतिः॥
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः।
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम्॥27॥
अर्थ :
हे शिव! ॐ के अ, उ, म – तीन अक्षर तीन लोक, तीन देव और तीन अवस्थाओं के द्योतक हैं। पर पूर्ण ओंकार ध्वनि आपके तुरीय (त्रिगुणातीत) स्वरूप को प्रकट करती है।
श्लोक २८
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह महांस्तथा।
भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्॥
अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रविचरति देवः श्रुतिरपि।
प्रियायास्मै धाम्ने प्रणिहितनमस्योऽस्मि भवते॥28॥
अर्थ :
हे शिव! वेद एवं देवगण आपके आठ नामों— भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम और ईशान— से आपकी वंदना करते हैं। मैं भी भावपूर्वक आपको प्रणाम करता हूँ।
श्लोक २९
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो।
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः॥
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो।
नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः॥29॥
अर्थ :
हे प्रभु! आप दूर भी हैं और निकट भी, सूक्ष्म भी हैं और विराट भी, वृद्ध भी हैं और युवा भी। आप सर्वत्र हैं फिर भी सबसे परे हैं। आपको मेरा बार-बार प्रणाम है।
श्लोक ३०
बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः।
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः॥
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः।
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः॥30॥
अर्थ :
हे प्रभु! रजोगुण से सृष्टि करने वाले ब्रह्मरूप को, तमोगुण से संहार करने वाले रुद्ररूप को, सत्त्वगुण से पालन करने वाले विष्णुरूप को तथा त्रिगुणातीत शिवस्वरूप को मेरा नमन है।
श्लोक ३१
कृशपरिणतिचेतः क्लेशवश्वं क्व चेदम्।
क्व च तव गुणसीमोल्लङ्घिनीशश्वदृद्धिः॥
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधात्।
वरद चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम्॥31॥
अर्थ :
हे वरदाता! मेरा मन क्लेश और भ्रम से भरा है, फिर भी आपकी अनन्त महिमा का गान करने की मेरी भक्ति मुझे प्रेरित कर रही है। मैं यह वाणी-पुष्प आपके चरणों में अर्पित करता हूँ।
श्लोक ३२
असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे।
सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी॥
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं।
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥32॥
अर्थ :
हे शिव! यदि समुद्र स्याही बने, काले पर्वत काजल हों, कल्पवृक्ष की डाल लेखनी बने और पृथ्वी कागज— तब भी आपकी महिमा का अंत नहीं हो सकता।
श्लोक ३३
असुरसुरमुनीन्द्रं रचितस्येन्दुमौले।
ग्रन्थितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य॥
सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः।
रुचिरमलघुवृत्तेः स्तोत्रमेतच्चकार॥33॥
अर्थ :
हे प्रभु! आप देव, दानव और मुनियों के पूजनीय हैं, चन्द्र को मस्तक पर धारण करने वाले तथा गुणातीत ईश्वर हैं। आपकी महिमा से प्रेरित होकर मैं पुष्पदन्त गन्धर्व यह स्तोत्र रचता हूँ।
श्लोक ३४
अहरहरनवद्य धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्।
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः॥
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र।
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च॥34॥
अर्थ :
जो मनुष्य पवित्र हृदय और परम भक्ति से इस स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, वह इस लोक में धन, पुत्र, आयु और कीर्ति प्राप्त करता है तथा देहत्याग के बाद शिवलोक में शिवतुल्य सुख पाता है।
श्लोक ३५
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्॥35॥
अर्थ :
शिव से बढ़कर कोई देव नहीं, शिवमहिम्न स्तोत्र से श्रेष्ठ कोई स्तोत्र नहीं, शिव नाम से बढ़कर कोई मंत्र नहीं और गुरु से बढ़कर कोई तत्त्व नहीं है।
श्लोक ३६
दीक्षादानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥36॥
अर्थ :
दीक्षा, दान, तप, तीर्थयात्रा, ज्ञान और यज्ञादि कर्म — ये सभी शिवमहिम्न स्तोत्र के पाठ के सोलहवें भाग के भी समान नहीं हैं।
श्लोक ३७
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः।
शशिधरवरमौलेर्देवदेवस्य दासः॥
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्।
स्तवनमिदमकार्षीद्विदिव्यदिव्यं महिम्नः॥37॥
अर्थ :
सभी गन्धर्वों के राजा पुष्पदन्त, चन्द्रमौलि देवाधिदेव महादेव के दास थे। उनके क्रोध से अपनी महिमा खोकर उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु इस दिव्य शिवमहिम्न स्तोत्र की रचना की।
श्लोक ३८
सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुम्।
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेतः॥
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः।
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्॥38॥
अर्थ :
जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर, हाथ जोड़कर इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह देवों और मुनियों द्वारा पूजित भगवान शिव के समीप अवश्य पहुँचता है। यह पुष्पदन्त कृत स्तोत्र अमोघ फल देने वाला है।
श्लोक ३९
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्वभाषितम्।
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम्॥39॥
अर्थ :
गन्धर्व पुष्पदन्त द्वारा रचित, ईश्वर की महिमा से परिपूर्ण, अनुपम, मनोहर और पुण्यदायक यह स्तोत्र यहाँ पूर्ण होता है।
श्लोक ४०
इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्करपादयोः।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः॥40॥
अर्थ :
हे सदाशिव! वाणी द्वारा की गई यह मेरी पूजा आपके चरणों में अर्पित है। कृपया इसे स्वीकार कर मुझ पर सदा प्रसन्न रहें।
श्लोक ४१
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः॥41॥
अर्थ :
हे महेश्वर! मैं आपके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता। आप जैसे भी हैं, जो भी हैं, मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ।
श्लोक ४२
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते॥42॥
अर्थ :
जो मनुष्य इस स्तोत्र का दिन में एक, दो या तीन बार पाठ करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त करता है।
श्लोक ४३
श्री पुष्पदन्तमुखपङ्कजनिर्गतेन।
स्तोत्रेण किल्विषहरेण हरप्रियेण॥
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन।
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः॥43॥
अर्थ :
पुष्पदन्त के मुख से उत्पन्न, पापों का नाश करने वाला, भगवान शिव को अत्यन्त प्रिय यह स्तोत्र — जो इसे पढ़ता, गाता या धारण करता है, उस पर भोलेनाथ अवश्य प्रसन्न होते हैं।
।। इति श्री पुष्पदंत विरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

शिवमहिम्न स्तोत्र भगवान शिव को अत्यन्त प्रिय है। जो व्यक्ति विधि-विधान और श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह इस लोक में धन, वैभव और यश प्राप्त करता है तथा देह त्याग के पश्चात शिवलोक को प्राप्त होता है।

मान्यता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के महान संत श्री रामकृष्ण परमहंस इस स्तोत्र का पाठ करते हुए समाधि में प्रविष्ट हुए थे। इस स्तोत्र में कुल 43 श्लोक हैं।


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